कृषि समाचार

देशभर में शुरू होंगी 5 रीजनल एग्रो-क्लाइमेटिक कॉन्फ्रेंस, राजस्थान से हुआ ऐतिहासिक आगाज़

Metroheadlines अप्रैल 7, 2026 0

 

भारत में कृषि सुधार की नई पहल: रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस की शुरुआत राजस्थान से

 

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा हाल ही में किया गया एक महत्वपूर्ण ऐलान देश के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Twitter (अब X) पर जानकारी देते हुए बताया कि भारत के अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, विविध जलवायु, मिट्टी की संरचना, मौसम की परिस्थितियों और फसलों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए अब देशभर में पाँच रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। इन कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर किसानों की समस्याओं को समझना, समाधान खोजना और कृषि क्षेत्र को अधिक सशक्त बनाना है। इस पहल की शुरुआत राजस्थान की पवित्र भूमि से की गई है, जिसे कृषि नवाचारों और पारंपरिक खेती के संगम के रूप में देखा जा रहा है।

 

भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में कृषि केवल एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। अलग-अलग राज्यों में जलवायु, मिट्टी की गुणवत्ता और वर्षा के पैटर्न में भारी अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गेहूं और धान की खेती प्रमुख है, जबकि दक्षिण भारत में चावल, नारियल और मसालों की खेती अधिक होती है। इसी तरह, पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में बाजरा और दालें उगाई जाती हैं। ऐसे में एक समान कृषि नीति या रणनीति पूरे देश पर लागू करना प्रभावी नहीं हो सकता। यही कारण है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने क्षेत्रीय स्तर पर कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का निर्णय लिया है।

 

इन रीजनल कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और अन्य संबंधित हितधारकों को एक मंच पर लाना है, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकें और क्षेत्र विशेष की चुनौतियों का समाधान खोज सकें। इन सम्मेलनों में जल प्रबंधन, मिट्टी की उर्वरता, आधुनिक तकनीक का उपयोग, फसल विविधीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों के बारे में भी किसानों को जागरूक किया जाएगा, ताकि वे इनका अधिकतम लाभ उठा सकें।

 

राजस्थान से इस पहल की शुरुआत करना भी एक रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है। राजस्थान का अधिकांश हिस्सा शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु वाला है, जहां जल संकट और मिट्टी की उर्वरता बड़ी चुनौतियां हैं। इसके बावजूद यहां के किसानों ने अपने अनुभव और नवाचारों के जरिए खेती को सफल बनाया है। ऐसे में यहां आयोजित पहली कॉन्फ्रेंस से अन्य क्षेत्रों के लिए भी सीखने का अवसर मिलेगा।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। जब नीतियां स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनाई जाती हैं, तो उनका प्रभाव अधिक होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में पानी की कमी है, तो वहां सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। वहीं, जहां पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां उच्च उत्पादकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

 

इसके अलावा, इन कॉन्फ्रेंस के जरिए कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और नवाचारों को भी बढ़ावा मिलेगा। आज के दौर में ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कृषि में तेजी से बढ़ रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से किसान अपनी फसल की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकते हैं और समय पर सही निर्णय ले सकते हैं। सरकार इन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से किसानों को इन नई तकनीकों से परिचित कराने की योजना बना रही है।

 

जलवायु परिवर्तन भी आज कृषि के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर समाधान खोजना बेहद जरूरी हो गया है। इन कॉन्फ्रेंस में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपायों पर भी विशेष जोर दिया जाएगा, जैसे कि जल संरक्षण, फसल बीमा और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना।

 

किसानों के लिए बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य मिलना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई बार किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। इन कॉन्फ्रेंस में कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन, ई-नाम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग और वैल्यू एडिशन पर भी चर्चा की जाएगी, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।

 

सरकार की इस पहल को देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल किसानों की समस्याओं का समाधान होगा, बल्कि कृषि क्षेत्र में नवाचार और विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में यह पहल भारत को कृषि के क्षेत्र में और अधिक मजबूत बना सकती है।

 

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UP News: होली से पहले सरकारी कर्मचारियों की होगी बल्ले-बल्ले, योगी सरकार ने लिया बड़ा फैसला

UP News In Hindi: सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के शिक्षकों समेत लाखों को कर्मचारियों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान कर दिया है. इसके लिए सरकार की तरफ से आदेश जारी किया गया है   होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह पर्व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को पड़ रही है। सामान्यतः सरकारी कर्मचारियों का वेतन महीने के अंतिम या अगले महीने के प्रारंभिक दिनों में जारी होता है, लेकिन इस बार त्योहार और अवकाश के कारण वेतन भुगतान की तिथि प्रभावित हो रही थी। रविवार (1 मार्च) को साप्ताहिक अवकाश तथा 2 मार्च को होलिका दहन होने के कारण नियमित प्रक्रिया से वेतन जारी करना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए शनिवार (28 फरवरी) को ही वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर त्वरित समन्वय और संवेदनशीलता को दर्शाता है।   शिक्षा विभाग की भूमिका   स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय की ओर से 2 मार्च से पहले वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। यह आदेश उत्तर प्रदेश स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारी और वित्तीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि होलिका दहन से पहले शिक्षकों और कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंच जाए।   शिक्षा विभाग राज्य का एक बड़ा विभाग है, जिसमें बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, राजकीय इंटर कॉलेज, सहायता प्राप्त विद्यालय और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से पहले वेतन देने के लिए विभाग को वित्तीय और तकनीकी स्तर पर व्यापक तैयारी करनी पड़ी। ट्रेजरी, बैंकिंग प्रणाली और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर भुगतान प्रक्रिया को तेज किया गया।     वित्त विभाग ने भी इस संबंध में शासनादेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया कि अवकाश के कारण नियमित तिथि पर वेतन भुगतान संभव नहीं था, इसलिए विशेष अनुमति के तहत अग्रिम भुगतान का निर्णय लिया गया है। इस फैसले को राज्यपाल Anandiben Patel की मंजूरी प्राप्त होने के बाद लागू किया गया।   राज्यपाल की स्वीकृति का उल्लेख इस बात का संकेत है कि यह निर्णय केवल विभागीय स्तर का नहीं बल्कि उच्च प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है। इससे आदेश की वैधता और गंभीरता स्पष्ट होती है।   प्रशासनिक समन्वय और कार्यान्वयन   राज्य सरकार की ओर से सभी जिलाधिकारियों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने-अपने विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन 28 फरवरी तक हर हाल में जारी करें। साथ ही आदेश के पालन को लेकर सख्त हिदायत दी गई। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी को गंभीरता से लिया जाएगा।   वेतन भुगतान की प्रक्रिया में निम्नलिखित स्तरों पर कार्य हुआ: वेतन बिलों की समयपूर्व तैयारी – संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) को समय से पहले वेतन बिल तैयार करने के निर्देश दिए गए। ट्रेजरी की सक्रियता – कोषागार कार्यालयों को अतिरिक्त समय तक कार्य कर बिल पास करने को कहा गया। बैंकिंग समन्वय – बैंकों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित किया गया कि भुगतान समय से कर्मचारियों के खातों में पहुंचे। डिजिटल प्रक्रिया का उपयोग – ई-भुगतान प्रणाली के माध्यम से प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाया गया कर्मचारियों में खुशी की लहर   इस निर्णय के बाद सरकारी कर्मचारियों में व्यापक खुशी देखी गई। त्योहारों के समय परिवारों की जरूरतें बढ़ जाती हैं—नए कपड़े, मिठाइयां, रंग-गुलाल, बच्चों के लिए उपहार, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने का खर्च आदि। ऐसे समय यदि वेतन में देरी हो जाए तो असुविधा होती है। सरकार द्वारा समय से पहले वेतन जारी करने से कर्मचारियों को आर्थिक रूप से राहत मिली है।   विशेष रूप से शिक्षकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उनके पास वेतन आने से स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ती है।   आर्थिक प्रभाव राज्य के लाखों कर्मचारियों को एक साथ वेतन जारी होने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा। होली के अवसर पर खरीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी लाभ होगा। वस्त्र, मिठाई, रंग-गुलाल, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि हो सकती है। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाला भी माना जा सकता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधि में तेजी आती है।   राजनीतिक और सामाजिक संदेश   Yogi Adityanath की सरकार का यह निर्णय कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। त्योहारों के समय इस प्रकार के निर्णय कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और सरकार के प्रति सकारात्मक भावना उत्पन्न करते हैं। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे संतुष्ट और प्रेरित हों तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से होता है। समय पर वेतन भुगतान कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी है।   पहले भी मिल चुकी हैं ऐसी सौगातें   पिछले वर्षों में भी त्योहारों से पहले बोनस या अग्रिम वेतन जैसी घोषणाएं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की जाती रही हैं। हालांकि हर बार परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इस बार अवकाश और त्योहार की तिथियों के कारण यह निर्णय आवश्यक हो गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि समय से पहले वेतन देने का निर्णय प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है, क्योंकि इसमें बजटीय प्रबंधन और नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखना होता है।   संभावित चुनौतियां   हालांकि आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि किसी विभाग में तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजी कमी या बैंकिंग समस्या उत्पन्न होती है तो कुछ कर्मचारियों को असुविधा हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।   कर्मचारियों की अपेक्षाएं   इस निर्णय के बाद कर्मचारियों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि भविष्य में भी त्योहारों के समय इसी प्रकार की संवेदनशीलता दिखाई जाएगी। साथ ही वे नियमित वेतन भुगतान, महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से संबंधित मुद्दों पर भी सरकार से सकारात्मक रुख की आशा रखते हैं।   UP NEWSYogi AdityanathHoli 2026  

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से पाएं तप, ज्ञान और मनोवांछित फल! जानें विधि, मंत्र और आरती

  Navratri Second Day Brahmacharini: नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, जो तप और संयम की देवी हैं. जानिए दूसरे दिन माता की पूजा विधि, मंत्र, भोग, आरती, और शुभ योग के बारे में?   Chaitra Navratri Second Day of Goddess Brahmacharini: चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri 2026) के दौरान माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. जहां पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है, वहीं दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. चैत्र नवरात्रि के मौके पर हम आपको मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से जुड़ी संपूर्ण जानकारी नीचे दे रहे हैं.    मां दुर्गा का दूसरा अवतार देवी ब्रह्मचारिणी तप, संयम, ज्ञान और वैराग्य की देवी हैं. माता को सफेद रंग के वस्त्र, चंदन, फूल और श्वेत मिठाई चढ़ाया जाता है. इस दिन का काफी खास महत्व है, क्योंकि पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बना हुआ है. आइए जानते हैं उनके मंत्र, पूजा विधि, कथा और आरती से जुड़ी सटीक जानकारी के बारे में.   मां ब्रह्मचारिणी के नाम का अर्थ?   मां ब्रह्मचारिणी तप शक्ति का प्रतीक हैं. ब्रह्मचारिणी माता की आराधना से भक्तों में तप की शक्ति बढ़ती है. इसके अलावा उन्हें मनोवांछित फल की भी प्राप्ति होती है. देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में से दूसरे स्वरूप का नाम देवी ब्रह्मचारिणी है. नवरात्रि के दूसरे दिन के दौरान मां के इस अवतार की पूजा संपूर्ण विधि-विधान से करनी चाहिए.    'ब्रह्मचारिणी' नाम का मतलब ब्रह्म और चारिणी से मिलकर बना हुआ है. ब्रह्म का अर्थ है तप या तपस्या, वही चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली. ऐसे में ब्रह्मचारिणी का शाब्दिक अर्थ है, तप का आचरण करने वाली देवी.   पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए मां ने इस रूप में कठोर तपस्या की थी.    नवरात्र के दूसरे दिन खास योग!   चैत्र नवरात्रि के दूसरे सर्वार्थ सिद्धि के साथ अमृत सिद्धि योग भी बन रहा है, जो शुक्रवार सुबह 6 बजकर 25 मिनट से लेकर देर रात 2 बजकर 27 मिनट तक रहेगा. इसके साथ ही शनिवार दोपहर2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक विजय मुहूर्त का संयोग बन रहा है.   धार्मिक मान्यता है कि, सर्वार्थ सिद्धि योग में शुरू किए गए काम सफल होते हैं और राहुकाल में कोई नया काम या पूजा करने से वह निष्फल होता है.    मां ब्रह्माचारिणी की पूजा विधि (Maa Brahmacharini Puja Vidhi)   नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर साफ वस्त्र धारण करें. इसके बाद आसन पर बैठकर मां का ध्यान करते हुए पूजा करें. उन्हें फूल, चंदन, अक्षत, रोली, धूप, भोग आदि अर्पित करें.   मां ब्रह्मचारिणी को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराएं. उसके बाद मां को उनका पसंदीदा भोग अर्पित करें. उन्हें पान, सुपारी, लौंग अर्पित करना शुभ माना जाता है.    मां ब्रह्मचारिणी से जुड़ा ध्यान मंत्र (Maa Brahmacharini Mantra)   या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। दधना करपद्याभ्यांक्षमालाकमण्डलू। देवीप्रसीदतु मयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥   इस मंत्र का अर्थ है कि, देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप दिव्यता से भरा है. माता के दाहिने हाथ में जप की माला तो बाएं हाथ में कमंडल है.  माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करने के लिए ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम: मंत्र का जाप करना चाहिए.    मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग (Maa Brahmacharini Bhog) नवरात्र के दूसरे मां ब्रह्मचारिणी को उनका प्रिय भोग शर्करा या गुड़ अर्पित करना शुभ माना जाता है. ऐसा करने से आयुष्मान का आशीर्वाद प्राप्त होता है.    ब्रह्मचारिणी माता जी की आरती (Maa Brahmacharini Aarti)   जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता। ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो। ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा। जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता। कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने। रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना। ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी।   रखना लाज मेरी महतारी।आरती करते समय खासतौर पर इस बात का ध्यान दें कि, देवी-देवताओं की 14 बार आरती उतारना है. 4 बार उनके चरणों पर से, 2 बार नाभि पर से, 1 बार मुख पर से और 7 बार पूरे शरीर पर से. आरती की बत्तियां 1, 5, 7 यानी विषम संख्या में ही बनाकर आरती करनी चाहिए.

भोपाल में NSG कमांडो का पावर शो:VIP पर अटैक और ड्रोन हमले को किया निष्क्रिय; सीएम बोले- काउंटर टेररिज्म ग्रुप के लिए DPR तैयार

  भोपाल में सोमवार को लाल परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) कमांडो ने पावर शॉ दिखाया। कमांडो ने हेलीकॉप्टर से उतरकर इमारत में घुसने, आतंकियों से मुकाबला करने, बम खोजने और निष्क्रिय करने, डॉग स्क्वॉड के जरिए आईईडी पहचानने और लोगों को सुरक्षित निकालने जैसी कार्रवाई का लाइव प्रदर्शन किया।   कार्यक्रम में मोहन यादव, पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा, NSG के महानिदेशक सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।   देखिए तस्वीरें…     NSG ने आतंकियों ने सरेंडर करवाया।     NSG के साथ डाॅग स्क्वार्ड का प्रदर्शन।     विपरीत परिस्थितियों में आम लोगों को आतंकियों से बचाते कमांडो।     सीएम बोले- 200 करोड़ रुपए की डीपीआर तैयार   इस मौके पर सीएम मोहन यादव ने कहा- सीपीजी काउंटर टेररिज्म ग्रुप बनाने के लिए मप्र सरकार ने 200 करोड़ रुपए की डीपीआर तैयार कर ली है। भविष्य में सभी प्रकार के खतरों से निपटने के लिए भोपाल के ग्राम तूमड़ा में सेंटर बनाया जाएगा।   उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की दुनिया के सामने पहचान बन रही है। जब देश के प्रधानमंत्री भी सुरक्षित नहीं थे और राजीव गांधी की हत्या हुई थी, तब सशस्त्र बलों ने अपने पराक्रम से सुरक्षा मुहैया कराई। जब भी देश में किसी संकट से सामना होता है, तब एनएसजी कमांडो रक्षा करते हैं। मुझे एनएसजी पर गर्व है।     'कोई हमें छेड़ेगा तो करारा जवाब मिलेगा'   सीएम कहा कि हमारी सेना देश के दुश्मनों के घर में घुसकर मारने का काम करती है। हम किसी को छेड़ते नहीं हैं, लेकिन यदि कोई हमें छेड़ेगा तो उसे करारा जवाब दिया जाएगा। यह संयुक्त प्रशिक्षण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संकल्प से सिद्धि का अभियान है। हम सर्वजन सुखाय की बात करते हैं। जो जिस प्रकार का है, उसे उसी प्रकार की भाषा में जवाब देने की तैयारी होनी चाहिए।   डॉ. यादव ने कहा कि हमारे बलों को सभी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता है। भारत और प्रदेश को आगे बढ़ने में कई लोग बाधा डालते हैं। हमने नक्सलवाद पर काबू पा लिया है। मप्र पुलिस और भारत सरकार ने मिलकर ऐसी गतिविधियों को रोकने में सफलता पाई है।     'हवा में उड़ते बजरंगबली जा रहे हों'   सीएम ने कहा कि हमारे कमांडो ने क्या-क्या नहीं दिखाया। जैसे हवा में बजरंगबली जा रहे हों। हमारे जवानों ने भी शानदार करतब दिखाए। काल भैरव के गणों ने भी गजब प्रदर्शन किया। आपका प्रदर्शन अद्भुत रहा।   आकस्मिक आपदा के लिए हम अपनी सशक्त भूमिका निभाना चाहते हैं। हमारे जवान सभी प्रकार के संकटों से निपटने में सक्षम हैं। खाली हाथ होते हुए भी वे दो-दो, चार-चार लोगों को उठाकर पटक रहे थे। यह देखकर आनंद आया।     डॉग स्क्वॉड ने आईईडी की पहचान   कमांडो ने Mi-17 helicopter से स्लिथरिंग कर इमारत में प्रवेश किया और हाउस इंटरवेंशन की कार्रवाई दिखाई। K-9 डॉग स्क्वॉड ने आईईडी की पहचान की, वहीं बम निष्क्रियकरण और एंटी-ड्रोन तकनीक का भी प्रदर्शन किया गया।   कमांडो ने बहुमंजिला भवन पर हमले को निष्क्रिय करने, आतंकियों से हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट और आम लोगों को सुरक्षित निकालने की ड्रिल भी प्रदर्शित की। इसके साथ ही वीआईपी सुरक्षा, क्राव मागा तकनीक और अंडरवॉटर डाइविंग से जुड़ी कार्रवाई भी दिखाई गई।  

हिंदी न्यूज़बिजनेसGold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव

Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव     सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज का ताजा भाव क्या है?     Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से बाजार में लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज शनिवार 28 फरवरी के कारोबारी दिन सोने-चांदी का ताजा भाव क्या है?     सोने के आउटलुक पर जेपी मॉर्गन का अपडेट     वैश्विक बाजार में सोने को लेकर नई उम्मीदें जताई जा रही हैं. जेपी मॉर्गन ने अपना लॉन्ग-टर्म प्राइस टारगेट बढ़ाकर 4,500 डॉलर प्रति औंस कर दिया है. जबकि 2026 के अंत के लिए 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान पहले की तरह कायम रखा है.   जेपी मॉर्गन के अनुसार निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्ट्रक्चरल डायवर्सिफिकेशन का रुझान अभी जारी है. जिससे आगे भी सोने में तेजी की संभावना बनी रह सकती है.     चांदी के ताजा भाव     दिल्ली, मंबई, कोलकाता और चेन्नई में चांदी की कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है. दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में 10 ग्राम चांदी आज 2,950 रुपये की दर पर बिक रहा है. वहीं, 100 ग्राम चांदी खरीदने के लिए ग्राहकों को 29,500 रुपये खर्च करने होंगे. चेन्नई में 10 ग्राम चांदी की कीमत 3,000 रुपये चल रही है.     आपके शहर में सोने का भाव (गुड रिटर्न के अनुसार)     दिल्ली में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए     मुंबई में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए     चेन्नई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,65,820 रुपए 22 कैरेट - 1,52,000 रुपए 18 कैरेट - 1,30,100 रुपए     कोलकाता में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए     अहमदाबाद में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए     लखनऊ में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए     पटना में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए     हैदराबाद में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए    

कृषि समाचार

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देशभर में शुरू होंगी 5 रीजनल एग्रो-क्लाइमेटिक कॉन्फ्रेंस, राजस्थान से हुआ ऐतिहासिक आगाज़

  भारत में कृषि सुधार की नई पहल: रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस की शुरुआत राजस्थान से   केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा हाल ही में किया गया एक महत्वपूर्ण ऐलान देश के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Twitter (अब X) पर जानकारी देते हुए बताया कि भारत के अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, विविध जलवायु, मिट्टी की संरचना, मौसम की परिस्थितियों और फसलों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए अब देशभर में पाँच रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। इन कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर किसानों की समस्याओं को समझना, समाधान खोजना और कृषि क्षेत्र को अधिक सशक्त बनाना है। इस पहल की शुरुआत राजस्थान की पवित्र भूमि से की गई है, जिसे कृषि नवाचारों और पारंपरिक खेती के संगम के रूप में देखा जा रहा है।   भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में कृषि केवल एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। अलग-अलग राज्यों में जलवायु, मिट्टी की गुणवत्ता और वर्षा के पैटर्न में भारी अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गेहूं और धान की खेती प्रमुख है, जबकि दक्षिण भारत में चावल, नारियल और मसालों की खेती अधिक होती है। इसी तरह, पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में बाजरा और दालें उगाई जाती हैं। ऐसे में एक समान कृषि नीति या रणनीति पूरे देश पर लागू करना प्रभावी नहीं हो सकता। यही कारण है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने क्षेत्रीय स्तर पर कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का निर्णय लिया है।   इन रीजनल कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और अन्य संबंधित हितधारकों को एक मंच पर लाना है, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकें और क्षेत्र विशेष की चुनौतियों का समाधान खोज सकें। इन सम्मेलनों में जल प्रबंधन, मिट्टी की उर्वरता, आधुनिक तकनीक का उपयोग, फसल विविधीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों के बारे में भी किसानों को जागरूक किया जाएगा, ताकि वे इनका अधिकतम लाभ उठा सकें।   राजस्थान से इस पहल की शुरुआत करना भी एक रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है। राजस्थान का अधिकांश हिस्सा शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु वाला है, जहां जल संकट और मिट्टी की उर्वरता बड़ी चुनौतियां हैं। इसके बावजूद यहां के किसानों ने अपने अनुभव और नवाचारों के जरिए खेती को सफल बनाया है। ऐसे में यहां आयोजित पहली कॉन्फ्रेंस से अन्य क्षेत्रों के लिए भी सीखने का अवसर मिलेगा।   विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। जब नीतियां स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनाई जाती हैं, तो उनका प्रभाव अधिक होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में पानी की कमी है, तो वहां सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। वहीं, जहां पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां उच्च उत्पादकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा सकता है।   इसके अलावा, इन कॉन्फ्रेंस के जरिए कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और नवाचारों को भी बढ़ावा मिलेगा। आज के दौर में ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कृषि में तेजी से बढ़ रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से किसान अपनी फसल की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकते हैं और समय पर सही निर्णय ले सकते हैं। सरकार इन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से किसानों को इन नई तकनीकों से परिचित कराने की योजना बना रही है।   जलवायु परिवर्तन भी आज कृषि के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर समाधान खोजना बेहद जरूरी हो गया है। इन कॉन्फ्रेंस में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपायों पर भी विशेष जोर दिया जाएगा, जैसे कि जल संरक्षण, फसल बीमा और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना।   किसानों के लिए बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य मिलना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई बार किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। इन कॉन्फ्रेंस में कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन, ई-नाम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग और वैल्यू एडिशन पर भी चर्चा की जाएगी, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।   सरकार की इस पहल को देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल किसानों की समस्याओं का समाधान होगा, बल्कि कृषि क्षेत्र में नवाचार और विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में यह पहल भारत को कृषि के क्षेत्र में और अधिक मजबूत बना सकती है।   अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, जलवायु, मिट्टी, मौसम और अलग-अलग फसलों के लिए हमने यह तय किया कि अब रीजनल कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। पूरे देश में ऐसी पाँच रीजनल कॉन्फ्रेंस होंगी। यह हमारा सौभाग्य है कि इनका शुभारंभ राजस्थान की इस पवित्र धरा से हो रहा है। pic.twitter.com/D7qDrM7xkP— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) April 7, 2026

Metroheadlines अप्रैल 7, 2026 0

रायसेन में 11–13 अप्रैल 2026 तक लगेगा राष्ट्रीय कृषि मेला, आधुनिक तकनीकों से किसानों की आय बढ़ाने पर फोकस

यूपी में आज से शुरू MSP पर गेहूं की खरीद, यहां रजिस्ट्रेशन करें किसान

गर्मी, युद्ध और अब बार‍िश-ओलावृष्ट‍ि से खतरे में खेती, ट्र‍िपल अटैक से बेहाल क‍िसान

गर्मी, युद्ध और अब बार‍िश-ओलावृष्ट‍ि से खतरे में खेती, ट्र‍िपल अटैक से बेहाल क‍िसान

  देश के किसानों को इस साल फरवरी-मार्च में तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. अचानक बढ़ी गर्मी से गेहूं की पैदावार में कमी, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण कृषि उत्पादों के निर्यात में बाधा, और बेमौसम बारिश से तैयार फसलों को भारी नुकसान.     देश के किसानों पर एक ही महीने में तिहरी मार पड़ी है. मौसम में अचानक आए उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में जारी जंग का असर और बेमौसम बारिश—इन तीनों ने मिलकर  लगभग हर प्रमुख फसल को प्रभावित कर दिया है. स्थिति ऐसी है कि अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां और बागवानी सभी फसलें किसी न किसी मोर्चे पर गंभीर दबाव में हैं. पूरे हालात से स‍िर्फ क‍िसान ही परेशान नहीं हैं बल्क‍ि केंद्र सरकार की भी टेंशन बढ़ गई है. पूरे हालात की समीक्षा के ल‍िए सरकार बैठक पर बैठक कर रही है. लेक‍िन सवाल यह है क‍ि इतने बड़े संकट को झेल रहे क‍िसानों के जख्म पर मरहम कौन लगाएगा?    सबसे बड़ी चिंता गेहूं को लेकर है. फरवरी-मार्च का समय गेहूं की भरपूर पैदावार के लिए बेहद अहम माना जाता है, लेकिन इस बार तापमान में अचानक वृद्धि ने हीट स्ट्रेस की स्थिति बना दी. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उपज में कमी आने की आशंका है.   दूसरा बड़ा झटका पश्चिम एशिया की जंग से लगा है. इस संघर्ष के चलते समुद्री रूट डिस्टर्ब हो गए हैं और भारत के कई प्रमुख कृषि उत्पादों का निर्यात लगभग ठप हो गया है. बासमती चावल, प्याज, केला और अंगूर जैसे उत्पाद, जिनकी रमजान के दौरान पश्चिम एशिया में भारी मांग रहती है, इस बार उस बाजार तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं. शिपिंग बंद होने से किसानों और निर्यातकों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.   तीसरी और सबसे ताजा मार बेमौसम बारिश की है. देश के कई हिस्सों में अचानक हुई तेज बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया है आलू, सरसों, प्याज और दालें—जो कटाई के बिल्कुल करीब थीं—अब खराब होने के खतरे में हैं. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ सकता है.   कुल मिलाकर, इस साल  की शुरुआत किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है. मौसम, अंतरराष्ट्रीय हालात और प्राकृतिक मार के मिलेजुले प्रभाव ने देश की कृषि व्यवस्था को झकझोर दिया है.   फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी का गेहूं पर असरफरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी को लेकर करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) के पूर्व डायरेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह ने 'किसान तक' से कहा, पूरे हरियाणा में कोई नुकसान नहीं है और आगे भी किसी नुकसान की आशंका नहीं है.   देश के अन्य राज्यों की बात करें तो अक्तूबर अंत से दिसंबर अंत तक गेहूं की बुआई होती है. इस अलग-अलग स्टेज में मौसम के मुताबिक गेहूं की खेती होती है. अभी तक रात का तापमान अच्छा रहा है जो गेहूं की खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसलिए, गेहूं के उत्पादन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है. सबकुछ ठीक रहेगा.   बिहार में गेहूं की खेती पर क्या असर होगा? इसके जवाब में पूसा, बिहार के गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डीके सिंह ने कहा, जिस गेहूं की बुआई 15 दिसंबर के बाद हुई है, उस पर बुरा असर पड़ेगा. 10 से 20 दिसंबर के बीच बोई गई फसल पर आंशिक असर और नवंबर की खेती पर कोई असर नहीं होगा. डीके सिंह ने कहा, बिहार के अधिकांश जिलों में 10 से 20 दिसंबर के बीच गेहूं की बुआई है, इसलिए उत्पादन पर आंशिक असर हो सकता है. हालांकि जिन खेतों में अभी नमी है, उसका उत्पादन प्रभावित नहीं होगा.    उत्तर प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हाल रहेगा. बुंदेलखंड का इलाका गेहूं के लिए प्रमुख है, वहां गर्मी का असर देखा गया है. केवीके जालौन के अध्यक्ष और हेड डॉ. मोहम्मद मुस्तफा ने बताया कि बुंदेलखंड में इन दिनों तापमान में बढ़ोतरी हुई है. जालौन में तापमान 38 डिग्री तक पहुंच गया है जबकि झांसी में 40 डिग्री तक. ऐसे में बढ़ते तापमान का गेहूं के उत्पादन पर असर पड़ेगा.   लगातार 1 हफ्ते तक तापमान में बढ़ोतरी का असर गेहूं के बालियों के दानों पर पड़ता है. इससे दाने पतले हो जाते हैं. ऐसे में प्रति एकड़ उत्पादन में 5 से 7% गिरावट देखने को मिलेगी. जिन किसानों ने मार्च की शुरुआत में हल्की सिंचाई कर दी थी, उन पर असर कम दिखाई देगा.     गर्मी का सबसे अधिक असर पंजाब के मालवा क्षेत्र में देखा जा रहा है. संगरूर जिले के किसान हरजिंदर सिंह ने 'किसान तक' से कहा, फरवरी के अंतिम सप्ताह में तेज गर्मी पड़ी. अचानक बढ़ी गर्मी ने गेहूं को भारी नुकसान पहुंचाया है. गेहूं के दाने में बदलाव आ गया. उस दौरान मौसम कुछ ठंडा रहता तो गेहूं के दाने फूलते, लेकिन अचानक गर्मी से दाना कमजोर रह गया. ठंड से जहां दाना बढ़ता है, वहीं गर्मी से दाने सिकुड़ते हैं. इससे गेहूं का वजन कम हो गया.   संगरूर में 16 एकड़ की खेती करने वाले हरजिंदर सिंह ने बताया कि इस बार प्रति एकड़ 4-5 क्विंटल गेहूं का नुकसान होगा. यह असर केवल संगरूर तक सीमित नहीं नहीं बल्कि कई जिले चपेट में हैं. मानसा, पटियाला, बठिंडा, मलेर कोटला, मोगा और बरनाला जिलों में गेहूं को बहुत अधिक नुकसान है. मालवा पट्टी के जितने जिले हैं, जहां गेहूं की अधिक खेती होती है, वहां गेहूं का उत्पादन बड़े पैमाने पर कम रहेगा.    संगरूर जिले में लड्डी गांव के किसान जगतार सिंह ने बताया  पहले गर्मी ने गेहूं को नुकसान पहुंचाया और अब बारिश ने पूरा तबाह कर दिया. गेहूं की उपज में 30 फीसद तक गिरावट आ सकती है. प्रति एकड़ 4 क्विंटल तक कमी की आशंका है. जगतार सिंह ने कहा कि संगरूर जिले के लगभग सभी किसान गर्मी और बेमौसम बारिश से प्रभावित हुए हैं.    पंजाब से सटे हरियाणा में किसानों ने मिलीजुली प्रतिक्रिया दी. वे बताते हैं कि हीट स्ट्रेस जैसी कोई समस्या नहीं है, लेकिन अचानक हुई बारिश ने गेहूं को नुकसान पहुंचाया है. किसानों ने बताया कि फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी से पहले ही गेहूं के दाने अपने फाइनल स्टेज में आ गए थे, इसलिए गर्मी का कोई असर नहीं नहीं होगा.   पश्चिम एशिया की लड़ाई किसानों पर भारी पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने भारत के निर्यात को बहुत प्रभावित किया है. बासमती चावल, प्याज, अंगूर, केला, आलू जैसी उपज का निर्यात ठप हो गया है. इसका सबसे अधिक नुकसान पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को उठाना पड़ा है.    मिडिल ईस्ट भारत के कृषि निर्यात का बहुत बड़ा बाजार है. भारत से हर साल बड़ी मात्रा में बासमती चावल, प्याज, अंगूर, अनार और दालें खाड़ी देशों में भेजे  जाते हैं. ईरान, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात, इनमें प्रमुख बाजार हैं. लेकिन अब युद्ध के कारण समुद्री रास्तों में बाधा आ गई है. जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, कंटेनर बंदरगाहों पर फंस रहे हैं और लॉजिस्टिक संकट पैदा हो गया है.   पंजाब बासमती राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PBREA) के डायरेक्टर अशोक सेठी के अनुसार, मिडिल ईस्ट के देशों में बिरयानी की भारी लोकप्रियता के कारण भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यात इसी क्षेत्र में   होता है. यही वजह है कि यह इलाका भारतीय बासमती का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजार माना जाता है. लेकिन वर्तमान में इस क्षेत्र में चल रहे युद्ध ने पूरे बासमती कारोबार को गहरे संकट में धकेल दिया है.   सेठी बताते हैं कि अधिकांश निर्यात उधार पर होता है, जिसके चलते बड़ी मात्रा में भुगतान अटका हुआ है. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (ECGC) के माध्यम से व्यापारियों को भुगतान की गारंटी उपलब्ध कराई जाए.    उनके मुताबिक, यदि निर्यात पूरी तरह बंद हो गया या कम हुआ, दोनों ही स्थितियों में किसानों को बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि निर्यात घटने से बासमती के दाम गिरेंगे और इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा. भुगतान में अड़चनों के चलते कई सौदों के रद्द होने की आशंका भी बढ़ गई है.   राजस्थान के बूंदी को बासमती का कटोरा कहा जाता है. यहां से बड़ी मात्रा में चावल का निर्यात खाड़ी देशों, विशेष रूप से ईरान और आसपास के क्षेत्रों में होता रहा है. लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से निर्यात गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं. व्यापारियों के अनुसार, जैसे ही युद्ध की स्थिति बनी, विदेशी खरीदारों ने ऑर्डर रोक दिए और नए सौदों से दूरी बना ली.   बासमती से बुरा हाल महाराष्ट्र के प्याज, केला और अंगूर का हुआ है. बीच रमजान में इन उपजों की मांग ठप हो गई. पूरे पश्चिम एशिया के देश भारत के कृषि उत्पादों पर निर्भर हैं, लेकिन लड़ाई ने सबकुछ चौपट कर दिया. रमजान और ईद के दौरान खाड़ी देशों में बढ़ने वाली केला मांग ने हमेशा महाराष्ट्र के जलगांव और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के किसानों को अच्छी कमाई दिलाई है, लेकिन इस बार हालात पूरी तरह उलट गए हैं.   ईरान–अमेरिकी लड़ाई के चलते खाड़ी देशों के रास्ते बंद होने, माल वापस लौट आने और जेबेल अली जैसे बड़े बंदरगाहों पर लोडिंग–अनलोडिंग रुक जाने से निर्यात प्रभावित हुआ है. हजारों टन केला खेतों, ट्रकों और कंटेनरों में फंसा है. कई खेप बीच रास्ते से वापस लौट रही है, जिससे किसानों पर भारी आर्थिक मार पड़ी है.   जुन्नर का नारंगा इलाका महाराष्ट्र में अंगूर का हब है. यहां से हजारों टन फल और सब्जियां दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट होते हैं. हालिया घटनाक्रम के  बारे में किसान प्रकाश वाघ कहते हैं, रमजान का महीना है, लेकिन अंगूर किसानों में मायूसी है.   इस महीने अंगूर की सबसे अधिक सप्लाई पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के देशों में भेजी जाती है. मगर ईरान-अमेरिका की लड़ाई से सबकुछ ठप हो गया है. प्रकाश वाघ हर साल लगभग 50-60 क्विंटल अंगूर निर्यात करते हैं, लेकिन अभी तक 5-6 क्विंटल ही सप्लाई कर सके हैं. इस लड़ाई से उन्हें 50 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है.   बेमौसम बारिश से किसान और फसल तबाह जानकारों की मानें तो किसानों को जितना नुकसान हीट स्ट्रेस और लड़ाई से नहीं हुआ, उससे कहीं अधिक मार्च महीने की बेमौसम बारिश ने कर दिया. देश का लगभग हर क्षेत्र बारिश से प्रभावित है. हरियाणा में करनाल के रहने वाले कमलदीप बताते हैं कि हालिया बारिश से गेहूं और लहसुन को बहुत नुकसान हुआ है. 13 अप्रैल से गेहूं की खरीद शुरू होनी है, लेकिन कटाई के आसपास ही बारिश होने से फसल को क्षति हुई है. गेहूं की फसल गिर गई है और लहसुन के खेत में पानी भर गया है. इससे किसानों पर तगड़ी मार पड़ी है.   हरियाणा में ही रेवाड़ी के देशराज चौहान बताते हैं, बारिश से सरसों, गेहूं, चना और ग्वार की फसल पर असर है. जिन किसानों ने अपनी सरसों , गेहूं, चना और ग्वार की फसल पर असर है. जिन किसानों ने अपनी सरसों मंडी में बेच दी है, उन्हें तो फायदा होगा, लेकिन जिनकी उपज मंडी में अभी तुली नहीं है वे बहुत नुकसान में हैं. कई किसानों की सरसों मंडी में बह गई, अब उनकी लागत भी नहीं निकल पाएगी.   बारिश और तेज हवा से गेहूं की फसल गिर गई है जिससे दाने कमजोर होंगे और उत्पादन गिर जाएगा. देशराज कहते हैं, खेतों में गिरी फसल को काटने का खर्च भी बढ़ेगा. अब मजदूरों को गेहूं को सुलझा कर काटना होगा जिससे समय बढ़ेगा. मजदूर कटाई के लिए पहले 5 हजार रुपये प्रति किल्ले मांगते थे, लेकिन अब 10 हजार रुपये मांगेंगे. इससे किसानों को डबल नुकसान होगा.    महाराष्ट्र  में भी बारिश से बहुत नुकसान है. अमरावती में ओलावृष्टि का कहर देखा गया है. यहां गेहूं, संतरा, तरबूज, नींबू-प्याज सहित कई फसलें बर्बाद हो गई हैं. तेज हवा और बारिश के साथ ओले गिरे हैं जिससे कटाई की कगार पर खड़ी रबी फसल तबाह हो गई है. किसानों ने मुआवजे की मांग तेज कर दी है.   कुल मिलाकर, देश के कई राज्यों के किसानों पर इस समय तिहरी मार पड़ी है—हीट स्ट्रेस से गेहूं प्रभावित हुआ, पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण बासमती सहित कई कृषि उत्पादों का निर्यात ठप पड़ा, और ऊपर से बेमौसम बारिश ने तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया. इन तीनों संकटों का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है. 

Metroheadlines मार्च 20, 2026 0

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