📰 ईरान-अमेरिका सीजफायर के बीच पाकिस्तान-इजरायल टकराव: मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और कूटनीतिक संकट मध्य पूर्व (Middle East) एक बार फिर वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया है। एक ओर ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के बीच संभावित सीजफायर की चर्चा चल रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान और इजरायल के बीच बयानबाजी ने हालात को और अधिक जटिल बना दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने क्षेत्रीय स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा समीकरणों को नई चुनौती दी है। 🔥 क्या है पूरा मामला? पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में सोशल मीडिया पर इजरायल को लेकर बेहद विवादित बयान दिया। उन्होंने इजरायल को “कैंसर” बताते हुए कहा कि यह देश दुनिया के लिए अभिशाप है और इसके निर्माताओं को “नर्क की आग में जलना चाहिए।” यह बयान ऐसे समय आया जब इस्लामाबाद में शांति वार्ता की संभावनाएं बन रही थीं। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद ख्वाजा आसिफ ने अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया। 🇮🇱 इजरायल की तीखी प्रतिक्रिया इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस बयान को “अस्वीकार्य” करार दिया। उन्होंने कहा कि: “किसी भी सरकार के जिम्मेदार मंत्री द्वारा इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना बेहद चिंताजनक है, खासकर तब जब वह देश खुद को शांति प्रक्रिया का हिस्सा बताता हो।” इजरायल के विदेश मंत्री गिडियन सार ने भी पाकिस्तान की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे बयान हिंसा को बढ़ावा देते हैं और इससे इजरायल की सुरक्षा को खतरा बढ़ सकता है। ⚔️ इजरायल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष ने बढ़ाया तनाव इस विवाद के पीछे एक बड़ा कारण हिज़्बुल्लाह और इजरायल के बीच चल रहा संघर्ष भी है। लेबनान में हाल ही में हुए हमलों में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। लेबनान में हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। इजरायल लगातार हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले कर रहा है, जबकि हिज़्बुल्लाह भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। 🕊️ सीजफायर पर मतभेद जहां शहबाज शरीफ का कहना है कि सीजफायर पूरे क्षेत्र पर लागू होना चाहिए, वहीं इजरायल और अमेरिका का मानना है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मतभेद सामने आए हैं। कई देशों का मानना है कि अगर लेबनान को शामिल नहीं किया गया, तो शांति प्रक्रिया अधूरी रह जाएगी। 🇮🇷 ईरान का रुख और कूटनीतिक दबाव ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि लेबनान में हमले नहीं रुके, तो वह अमेरिका के साथ होने वाली शांति वार्ता को टाल सकता है। ईरान, जो हिज़्बुल्लाह का प्रमुख समर्थक माना जाता है, इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यदि ईरान वार्ता से पीछे हटता है, तो यह न केवल सीजफायर प्रयासों को प्रभावित करेगा बल्कि क्षेत्रीय तनाव को और अधिक बढ़ा सकता है। 🌍 अमेरिका की भूमिका संयुक्त राज्य अमेरिका इस पूरे घटनाक्रम में एक मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अमेरिका की कोशिश है कि इजरायल और ईरान के बीच सीधा टकराव टाला जाए और क्षेत्र में शांति स्थापित की जा सके। हालांकि, लेबनान को लेकर मतभेद और इजरायल की सैन्य कार्रवाई ने अमेरिका की कोशिशों को कठिन बना दिया है। 🧭 आगे क्या हो सकता है? आने वाले दिनों में कुछ अहम घटनाएं हो सकती हैं: अमेरिका में इजरायल और लेबनान के बीच संभावित वार्ता ईरान का शांति वार्ता में शामिल रहने या हटने का फैसला हिज़्बुल्लाह और इजरायल के बीच संघर्ष का विस्तार पाकिस्तान और इजरायल के बीच कूटनीतिक तनाव का बढ़ना अगर इन मुद्दों का समाधान नहीं हुआ, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। 📊 विश्लेषण: क्यों बढ़ रहा है तनाव? राजनीतिक बयानबाजी नेताओं के आक्रामक बयान स्थिति को और भड़का रहे हैं। धार्मिक और क्षेत्रीय टकराव मध्य पूर्व में लंबे समय से धार्मिक और राजनीतिक मतभेद हैं। प्रॉक्सी वॉर (Proxy War) ईरान और इजरायल के बीच अप्रत्यक्ष संघर्ष लंबे समय से चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की भूमिका अमेरिका, रूस और अन्य देशों के हित भी इस क्षेत्र में जुड़े हुए हैं।
Al Jubail Attack: ईरान ने इजरायली हमले के बदले सऊदी अरब के इंडस्ट्रियल शहर अल जुबैल पर हमला किया. ये सऊदी को अरबों डॉलर महंगा पड़ सकता है, क्योंकि यह सिर्फ शहर नहीं, सऊदी अरब की 'कमाई का जरिया' है. 7 अप्रैल 2026 की सुबह पश्चिम एशिया में तनाव ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया, जब ईरान ने सऊदी अरब के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र अल जुबैल इंडस्ट्रियल सिटी को निशाना बनाया। इस हमले के बाद क्षेत्र में जोरदार धमाकों, आग की ऊंची लपटों और धुएं के गुबार की तस्वीरें सामने आईं। सऊदी एयर डिफेंस सिस्टम ने कई बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया, लेकिन उनके मलबे ऊर्जा संयंत्रों के पास गिरने से संभावित नुकसान की आशंका बनी हुई है। यह हमला सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं है, बल्कि इसका असर सऊदी की अर्थव्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाजार और पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह हमला कितना बड़ा है और इसके क्या मायने हैं। अल जुबैल इंडस्ट्रियल सिटी: सऊदी की आर्थिक रीढ़ अल जुबैल इंडस्ट्रियल सिटी सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि सऊदी अरब का सबसे बड़ा औद्योगिक और पेट्रोकेमिकल हब है। यह शहर 1000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैला हुआ है और इसे दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स में गिना जाता है। यहां कई वैश्विक स्तर के प्लांट मौजूद हैं, जिनमें प्रमुख हैं: SABIC (Saudi Basic Industries Corporation) Saudi Aramco SATORP रिफाइनरी (अरामको और टोटल का जॉइंट वेंचर) सदारा केमिकल कॉम्प्लेक्स अमीरल पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट SABIC अकेले ही दुनिया के लगभग 7% पेट्रोकेमिकल उत्पादन में योगदान देती है। यहां बनने वाले उत्पाद—प्लास्टिक, उर्वरक, मिथेनॉल, पॉलिमर—पूरी दुनिया की इंडस्ट्रीज के लिए जरूरी हैं। सऊदी की GDP में इस शहर का योगदान 7% से 12% तक माना जाता है, जबकि नॉन-ऑयल सेक्टर में इसका हिस्सा 11% से ज्यादा है। Vision 2030 के तहत यह शहर सऊदी को तेल-निर्भर अर्थव्यवस्था से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभा रहा है। ईरान ने हमला क्यों किया? यह हमला अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह पश्चिम एशिया में चल रहे लंबे तनाव का परिणाम है। हाल ही में इजरायल द्वारा ईरान के साउथ पार्स पेट्रोकेमिकल प्लांट पर किए गए हमले के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। ईरान ने साफ कहा था कि अगर उसके ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया गया, तो वह खाड़ी देशों के प्रमुख पेट्रोकेमिकल हब्स को टारगेट करेगा। इस हमले के पीछे मुख्य कारण: बदले की रणनीति क्षेत्रीय शक्ति संतुलन दिखाना ऊर्जा बाजार पर दबाव बनाना होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का विस्तार अगर अल जुबैल को भारी नुकसान हुआ तो क्या होगा? विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इस हमले में बड़े स्तर पर नुकसान होता है, तो इसका असर सिर्फ सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा। 1. औद्योगिक उत्पादन पर असर अगर SABIC या SATORP जैसे प्लांट प्रभावित होते हैं, तो: पेट्रोकेमिकल उत्पादन रुक सकता है ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित हो सकती है कई उद्योगों में कच्चे माल की कमी हो सकती है 2. अरबों डॉलर का नुकसान सऊदी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर डैमेज, उत्पादन रुकना और निर्यात घटने से अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव आएगा। 3. Vision 2030 पर असर Vision 2030 के तहत सऊदी अपनी अर्थव्यवस्था को डाइवर्सिफाई कर रहा है। अल जुबैल इस योजना का केंद्र है। अगर यह प्रभावित होता है, तो पूरे विजन को झटका लग सकता है। सऊदी अरब पर तीन बड़े असर 1. आर्थिक झटका पेट्रोकेमिकल निर्यात घटने से: विदेशी मुद्रा कम होगी नॉन-ऑयल सेक्टर कमजोर पड़ेगा निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है 2. ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बना हुआ है। अब घरेलू इंडस्ट्रियल हब पर हमला होने से सऊदी की ऊर्जा सुरक्षा पर दोहरा दबाव आ गया है। 3. राजनीतिक और सैन्य दबाव सऊदी को अब: अपनी रक्षा प्रणाली मजबूत करनी होगी संभावित जवाबी कार्रवाई पर विचार करना होगा क्षेत्रीय गठबंधनों को मजबूत करना होगा पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा? यह हमला ग्लोबल लेवल पर कई बड़े बदलाव ला सकता है। 1. महंगाई में उछाल अगर पेट्रोकेमिकल सप्लाई प्रभावित होती है: प्लास्टिक उत्पाद महंगे होंगे उर्वरक की कीमत बढ़ेगी दवाओं और ऑटो पार्ट्स की लागत बढ़ेगी विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक महंगाई 1.5% से 2% तक बढ़ सकती है। 2. तेल की कीमतों में उछाल पहले से ही ब्रेंट क्रूड की कीमतें ऊंची हैं। इस हमले के बाद: तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ेगा 3. सप्लाई चेन पर असर गल्फ क्षेत्र से दुनिया का: 20% तेल बड़ी मात्रा में LNG निकलता है। अगर यह बाधित हुआ, तो: यूरोप, एशिया और अफ्रीका प्रभावित होंगे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर असर पड़ेगा 4. क्लाइमेट गोल्स पर असर अल जुबैल में चल रहे कार्बन कैप्चर प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं, जिससे: ग्लोबल क्लाइमेट टारगेट्स पर असर पड़ेगा कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है क्या यह बड़ा युद्ध बन सकता है? इस हमले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह एक बड़े युद्ध की शुरुआत है? स्थिति अभी संवेदनशील है: ईरान और सऊदी अरब आमने-सामने हैं इजरायल पहले से ही शामिल है अमेरिका और अन्य वैश्विक शक्तियां स्थिति पर नजर रखे हुए हैं अगर जवाबी कार्रवाई होती है, तो यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व में फैल सकता है।
ईरान-अमेरिका जंग पर ब्रेक की उम्मीद: ‘इस्लामाबाद अकॉर्ड’ से बन सकती है सीजफायर डील, दुनिया की निगाहें अगले 48 घंटे पर मध्य पूर्व में जारी तनाव अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य झड़पों के बीच अब युद्ध विराम (सीजफायर) की संभावनाएं तेज हो गई हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच एक अहम शांति प्रस्ताव रखा है, जिसे अस्थायी तौर पर ‘इस्लामाबाद अकॉर्ड’ नाम दिया गया है। यह प्रस्ताव न सिर्फ युद्ध को रोकने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, बल्कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और सुरक्षा हालात पर भी गहरा असर पड़ सकता है। 📌 सीजफायर की ओर बढ़ते कदम: क्या है ‘इस्लामाबाद अकॉर्ड’? रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान की पहल पर तैयार इस प्रस्ताव को दो चरणों में लागू करने की योजना है। पहले चरण में तत्काल प्रभाव से सीजफायर लागू किया जाएगा, जिससे दोनों देशों के बीच जारी सैन्य गतिविधियों पर रोक लगेगी। दूसरे चरण में 15 से 20 दिनों के भीतर एक स्थायी शांति समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि यह प्रस्ताव सिर्फ युद्ध रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई रणनीतिक बिंदु शामिल हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल सप्लाई रूट्स में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। 🌍 पूरी रात चली बातचीत, पाकिस्तान की सक्रिय कूटनीति पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर ने इस प्रस्ताव को लेकर अमेरिकी और ईरानी नेताओं के साथ पूरी रात बातचीत की है। यह कूटनीतिक प्रयास इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। इस प्रक्रिया में मिस्र और तुर्किये भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन देशों की भागीदारी से यह साफ है कि क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। ⏳ 45 दिन का सीजफायर? पहले भी सामने आ चुका प्रस्ताव अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले 45 दिनों के अस्थायी सीजफायर का प्रस्ताव भी सामने आया था। इस दौरान दोनों पक्ष स्थायी शांति समझौते पर बातचीत कर सकते हैं। हालांकि, मौजूदा ‘इस्लामाबाद अकॉर्ड’ को ज्यादा व्यावहारिक और तत्काल समाधान के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि यह दो चरणों में स्पष्ट रोडमैप देता है। ⚠️ जंग के बीच बढ़ता खतरा: ईरान की वैश्विक सप्लाई रोकने की चेतावनी तनाव के बीच ईरान ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। उसने साफ तौर पर कहा है कि अगर अमेरिका और इजराइल की ओर से हमले जारी रहे, तो वह वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित कर सकता है। ईरान के सुप्रीम लीडर के सलाहकार अली अकबर वेलायती ने कहा कि जवाब सिर्फ सैन्य स्तर पर ही नहीं दिया जाएगा, बल्कि इसका असर वैश्विक ऊर्जा और व्यापार पर भी पड़ेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री मार्ग भी खतरे में आ सकते हैं। यह जलमार्ग रेड सी और हिंद महासागर को जोड़ता है, जिससे वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। 🚢 होर्मुज स्ट्रेट: दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन होर्मुज स्ट्रेट को अक्सर दुनिया की “ऊर्जा लाइफलाइन” कहा जाता है। अगर यह मार्ग बंद होता है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। ईरान की धमकी के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहले ही अस्थिरता देखने को मिल रही है। कई देशों ने वैकल्पिक सप्लाई रूट्स तलाशने शुरू कर दिए हैं। 🔥 ट्रम्प का कड़ा रुख: ‘नरक बना देंगे ईरान’ इस बीच डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोला, तो उसे “नरक जैसे हालात” का सामना करना पड़ेगा। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अमेरिका ईरान के पावर प्लांट्स और ब्रिज जैसे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला कर सकता है। उनका यह बयान तनाव को और बढ़ाने वाला माना जा रहा है। ⚔️ जंग का विस्तार: इजराइल, हिजबुल्लाह और हूती विद्रोही इस पूरे संकट में हिजबुल्लाह और यमन के हूती विद्रोही भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इजराइली सेना ने हाल ही में लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमला किया, जबकि हूती विद्रोहियों ने रेड सी में जहाजों को निशाना बनाने की धमकी दी है। इससे यह साफ है कि यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र में फैल चुका है। 🌐 वैश्विक असर: तेल, व्यापार और सुरक्षा पर खतरा ईरान-अमेरिका तनाव का असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों, सप्लाई चेन और व्यापार पर पड़ रहा है। अगर स्थिति बिगड़ती है, तो: तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट आ सकती है एशिया और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है समुद्री व्यापार बाधित हो सकता है भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। 🇮🇳 भारत पर असर: क्या हो सकता है प्रभाव? भारत के लिए यह संकट कई स्तरों पर चिंता का कारण बन सकता है। तेल कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ सकती है, वहीं व्यापार मार्ग बाधित होने से आयात-निर्यात प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा, मध्य पूर्व में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। ⏱️ अगले 48 घंटे क्यों हैं अहम? रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले 48 घंटे इस पूरे संकट के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। अगर ‘इस्लामाबाद अकॉर्ड’ पर सहमति बन जाती है, तो यह युद्ध को रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो यह संघर्ष और ज्यादा गंभीर रूप ले सकता है।
US Iran talks: अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर वार्ता के लिए पाकिस्तान सहित क्षेत्रीय देशों द्वारा किए जा रहे मध्यस्थता प्रयास अब विफल हो गए हैं. US Iran talks: अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के लिए की जा रही मध्यस्थता प्रयासों में ठहराव आ गया है. ईरान ने तय वार्ता में हिस्सा लेने से साफ इंकार कर दिया है. यह जानकारी द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान समेत क्षेत्रीय देशों द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर कराए जाने के प्रयास अब नाकाम साबित हो रहे हैं. ईरान ने मध्यस्थों को स्पष्ट रूप से कहा है कि वह आगामी दिनों में इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों से मिलने के लिए तैयार नहीं है और अमेरिका की मांगों को अस्वीकार्य मानता है. रिपोर्ट में कहा गया, “ईरान ने आधिकारिक तौर पर मध्यस्थों को बताया कि वह इस्लामाबाद में अमेरिकी अधिकारियों से मिलने को तैयार नहीं है और अमेरिकी मांगें अस्वीकार्य हैं.” पाकिस्तान की भूमिका पर असर इससे पहले पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की मेजबानी करने की पेशकश की थी, लेकिन मध्यस्थता प्रयासों में प्रगति न होने के कारण यह प्रस्ताव अब टल गया है. इस्लामाबाद ने कहा था कि वह सार्थक वार्ता की मेजबानी और सुविधा देने के लिए तैयार है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि देश सम्मानित महसूस करेगा और सार्थक वार्ता में मदद देगा.” अमेरिका की प्रतिक्रिया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिए थे कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत में है. उन्होंने कहा था, “हम इस वार्ता में बेहद अच्छी प्रगति कर रहे हैं." हालांकि उन्होंने कोई और विवरण नहीं दिया. ईरान का इनकार ईरान ने साफ कहा है कि वह पाकिस्तान के जरिए होने वाली बातचीत में शामिल नहीं है. ईरान के प्रवक्ता एस्माइल बाघई ने बताया कि अमेरिका से कोई सीधी बात नहीं हुई. सिर्फ दूसरे लोगों के जरिए अमेरिका की “ज्यादा और गलत” मांगें भेजी गई हैं. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपनी तरफ से कोशिश कर रहा है, लेकिन ईरान उसमें शामिल नहीं है. साथ ही उन्होंने कहा कि युद्ध खत्म होना अच्छा है, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि शुरुआत किसने की. ईरान को अमेरिका की तरफ से 15 पॉइंट का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उसे “अवास्तविक और बेकार” बताते हुए ठुकरा दिया गया.
Middle East Conflict: ईरान ने अमेरिका को पूरी तरह से जंग की बिसात पर घेर दिया है. ईरान ने अमेरिका इस युद्ध में काफी नुकसान तो पहुंचाया, साथ ही ट्रंप के मंसूबों को अभी तक कामयाब नहीं होने दिया West Asia Tensions: अमेरिकी राष्ट्रपति अपने ही बुने जाल में फंसते हुए ईरान युद्ध में नजर आ रहे हैं. वह ईरान की तरफ से बिछाई बिसात की 'ढाई चाल' में फंस गए हैं. इनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना, खाड़ी देशों में अमेरिकी कार्रवाई से हड़कंप और एक जो महत्वपूर्ण हैं, कि ईरान ने सीधे तौर पर इस युद्ध में अमेरिका को निशाने पर लेते हुए, उसके अन्य देशों में मौजूद एयरबेस को निशाना बनाया है. इसके अलावा एक तरफ अमेरिका पर युद्ध के दौरान पड़ा आर्थिक बोझ है, तो दूसरी तरफ ईरान भी किसी तरह से पीछे हटने को तैयार नहीं है. सहयोगी देशों ने भी उनका साथ देने से साफ इनकार कर दिया है, इनमें फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन जैसे नाटो सदस्य देश शामिल हैं. इसके अलावा लगातार अमेरिका का मिसाइल भंडार भी कम हो रहा है. अमेरिका इस युद्ध में रोजाना 1 अरब डॉलर खर्च कर रहा है. पांचवे हफ्ते में ही इस युद्ध में अमेरिका के मंसूबों पर पानी फिरता नजर आ रहा है. भले ही ट्रंप ने 2 अप्रैल को दी अपनी स्पीच में जंग खत्म न होने की बात साफगोई से कही हो, और कहा हो कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी जारी है, लेकिन अमेरिका युद्ध में हर मोर्चे पर कमजोर पड़ता हुआ दिख रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा है कि हम अपने टारगेट को पूरा करने के लिए अभियान जारी रखेंगे. अमेरिका अपने सभी लक्ष्य को जल्द पूरा करने की राह पर है. इसके अलावा उन्होंने आने वाले हफ्तों ईरान पर कड़ा प्रहार करने की धमकी दी है. साथ ही कहा है कि वह ईरान को वापस पाषाण युग (Stone Age) में ले जाएंगे. जहां वे वास्तव में थे. ईरान की 'ढाई चाल' जिसमें अमेरिका पूरी तरह घिर गया? ईरान पर अमेरिकी और इजरायल की तरफ से 28 फरवरी को की गई संयुक्त कार्रवाई में भले ही देश ने सुप्रीम लीडर को खो दिया था, लेकिन उसके बाद खामेनेई के लड़ाकों ने हर कदम फूंक-फूंककर रखा. सबसे पहले ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलने वाले जहाजों पर रोक लगाते हुए, रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया था. इससे वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति पर असर पड़ा, और पूरी दुनिया की लगभग सभी देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा गई. दुनिया में तेल आपूर्ति का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रमुख रास्ता है. इस स्थिति में ईरान ने मित्र देशों जिनमें भारत, रूस, चीन शामिल हैं, उनके लिए इस रास्ते को बंद नहीं किया. वहीं दुश्मन देशों के लिए इस रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया. इस रास्ते से लगभग 20% तेल दुनिया के देशों में भेजा जाता है. ईरान ने इस रास्ते से निकलने वाले जहाजों से टोल वसूलने की भी घोषणा की है. अमेरिकी कार्रवाई से खाड़ी देशों में हड़कंप, बढ़ा सुरक्षा का खतरा युद्ध के बाद से खाड़ी देशों में संघर्ष बढ़ गया. इन देशों में यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत जैसे देश शामिल हैं. ईरान से सीधे हमले का इन देशों को खतरा है. यूएई और बहरीन की इंडस्ट्रियल साइट दांव पर है. इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से इन देशों पर वैश्विक तेल आपूर्ति का असर सीधे तौर पर पड़ा है. खाड़ी देशों की सबसे प्रमुख चिंताएं एल्युमिनियम संयंत्र और बहरीन हमले में बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है. इसके अलावा ऊर्जा संकट का खतरा मंडरा रहा है. इन देशों का भरोसा भी अमेरिका पर कम हुआ है. यह सभी देश अन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. इसके अलावा यूएई में मौजूद प्रवासी कामगारों का भी खतरा बढ़ गया है. यूएई पर इस युद्ध का काफी असर पड़ा है. खाड़ी के देश खुलकर इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहते हैं. वह युद्ध में ईरान की आक्रमक कार्रवाई को लेकर इंटरनेशनल कम्युनिटी से गुहार भी लगा रहे हैं. अमेरिका एयरबेस को बनाया निशाना, सैन्य क्षमता को बनाया नुकसान इसके अलावा ईरान ने सीधे तौर पर अमेरिका को इस युद्ध में अपना दुश्मन मानकर उसके अन्य देशों में मौजूद एयरबेस को निशाना बनाया है. इनमें ईरान ने यूएई में प्रिंस सुल्तान एयरबेस समेत कई अन्य अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लिया है. इनपर भीषण मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इनमें अमेरिका का महत्वपूर्ण E-3 AWACS विमान नष्ट किया है. लगभग 12 अमेरिकी सैनिक इन हमलों में घायल हुए हैं. इसके अलावा यूएई में अलधाफरा एयरबेस और कतर में अल उदीद एयरबेस को भी ईरान ने निशाना बनाया है. इनपर भी करीबन 10 से 12 सैनिक घायल हुए हैं.
Iran Missile Attack: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को अगले दो-तीन हफ्तों में कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी और कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ तो सभी विद्युत संयंत्रों पर हमला किया जाएगा. Iran Missile Attack: ईरान ने गुरुवार को इजरायल की तरफ मिसाइलें दागीं. यह हमला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऑपरेशन एपिक फ्यूरी पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए दिए गए चेतावनी भरे संदेश के तुरंत बाद हुआ. ट्रंप ने ईरान को आग लगाना बंद करने और समझौता करने के लिए अल्टीमेटम दिया था. इजरायल की सेना ने बताया कि ईरानी मिसाइल हमले का जवाब देने के लिए उनकी वायु रक्षा प्रणाली सक्रिय है. सेना ने कहा कि हमने ईरान से इजरायल की सीमा की तरफ दागी गई मिसाइलों की पहचान की है और यह तीसरी बार था जब तीन घंटे से भी कम समय में मिसाइल दागी गई. रक्षा प्रणाली हमले को रोकने के लिए काम कर रही है. फ्रांस प्रेस एजेंसी ने बताया कि उत्तर इजरायल में एयर रेड सायरन बज गए, लेकिन अभी तक किसी के घायल होने या किसी नुकसान की खबर नहीं है. ट्रंप ने दी धमकी अपने भाषण में ट्रंप ने कहा कि ईरान अगले दो से तीन हफ्तों में बहुत कड़ी कार्रवाई झेलेगा और उसे स्टोन एज” यानी पत्थर युग में ले जाया जाएगा. ट्रंप ने कहा, “अब तक हमने जो भी तैयारी की है, वह पूरी होने के रास्ते पर है. बहुत जल्द हम ईरान पर बेहद कड़ी कार्रवाई करेंगे. अगले दो-तीन हफ्तों में हम उन्हें उनके असली स्थान यानी स्टोन एज में वापस भेज देंगे. हमारे लक्ष्य में बदलाव नहीं है, लेकिन उनके प्रमुख नेता की मृत्यु के बाद राजनैतिक बदलाव हुआ है. हमने कभी कहा नहीं कि हमें शासन बदलना है, लेकिन बदलाव हो गया." ट्रंप ने आगे चेतावनी दी कि “यदि इस अवधि में कोई समझौता नहीं होता है तो हम उनके सभी विद्युत उत्पादन केंद्रों पर एक साथ बहुत कड़ी कार्रवाई करेंगे.” अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध 28 फरवरी से शुरू हुआ था. इस दिन अमेरिका और इजरायल की अचानक की गई हवाई हमलों में ईरानी सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत गई थी. अमेरिका ने इस कार्रवाई का नाम ऑपरेशन एपिक फ्यूरी रखा, जबकि इजरायल ने इसे ऑपरेशन रोअरिंग लायन कहा.
Iran Isfahan Explosion: ईरान के इस्फहान शहर में जोरदार धमाके हुए हैं. इस हमले को अमेरिकी सेना ने अंजाम दिया है, जिसके लिए सेना ने बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल किया. Isfahan में हुए भीषण धमाकों ने पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव को और बढ़ा दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला United States की सेना द्वारा किया गया बताया जा रहा है, जिसमें कथित तौर पर बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल किया गया। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र में पहले से ही संघर्ष जारी है और हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स, जिनमें The Wall Street Journal भी शामिल है, के मुताबिक इस हमले में इस्फहान के एक संभावित परमाणु या सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया गया। इस्फहान, जो लगभग 23 लाख की आबादी वाला एक प्रमुख शहर है, ईरान के महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक केंद्रों में गिना जाता है। हमले के बाद Donald Trump द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में रात के समय हुए कई बड़े विस्फोट और आग की लपटें दिखाई दीं। हालांकि वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसे इसी हमले से जोड़कर देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि इन धमाकों से क्षेत्र में भारी नुकसान हुआ हो सकता है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी कहा गया है कि लगभग 2,000 पाउंड (करीब 907 किलोग्राम) वजन वाले बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल किया गया, जो जमीन के अंदर स्थित ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम होते हैं। इन बमों के कारण कई छोटे-बड़े विस्फोट हुए, जिससे आग और झटकों का असर दूर-दूर तक महसूस किया गया। इस घटना के बाद मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष को लेकर वैश्विक चिंता और गहरा गई है। Pakistan, Egypt, Saudi Arabia और Turkey जैसे देशों ने स्थिति को नियंत्रित करने और शांति बहाल करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं।
Middle East Conflict: अलीरेजा तंगसिरी आरजीसी के नौसेना प्रमुख थे. वह इस पद पर साल 2018 से थे. उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का सुरक्षा रणनीति का मास्टरमाइंड माना जाता रहा है. मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है. यहां इजरायली हमले में IRGC के नौसेना कमांडर अलीरेजा तंगसिरी की मौत की पुष्टी हुई है. हाल ही में इजरायल ने इस बात का दावा किया था कि होर्मुज स्ट्रेट बंद करने के लिए जिम्मेदार तंगसिरी की मौत हो गई है. इजरायली हमले के बाद गंभीर चोटों से वह उबर नहीं पाए. IRIB ने उनकी मौत की पुष्टी की है. इससे पहले इजरायल के रक्षामंत्री काट्ज ने पिछले हफ्ते जानकारी दी थी कि कमांडर को इजरायली सेना के लक्षित ऑपरेशन में मार गिराया गया था. अलीरेजा तंगसिरी आरजीसी के नौसेना प्रमुख थे. वह इस पद पर साल 2018 से थे. उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का सुरक्षा रणनीति का मास्टरमाइंड माना जाता रहा है. खाड़ी युद्ध में अमेरिका और इजरायल के जहाजों को चुनौती देने में उनकी भूमिका अहम रही थी. लीरेजा तंगसिरी 26 मार्च को हुए बंदर अब्बास में इजरायली हमले के दौरान गंभीर चोट के चलते घायल हो गए थे. ईरान के कई सैन्य और राजनीतिक हमले में मारे जा चुके हैं इससे पहले इस युद्ध में कई वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य हस्तियों की जान जा चुकी है. सबसे पहले इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर रहे अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में उनके परिसर पर हवाई हमला किया गया था. वह 86 साल के थे. 1989 से ईरान शीर्ष नेतृ्त्व संभाल रहे थे. इनके अलावा अली लारीजानी जो सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव थे. उनकी मौत 17 मार्च को हमले के दौरान हो गई थी. वह 67 साल के थे. ईरानी मीडिया के अनुसार उनके साथ उनके बेटे और उनके एक डिप्टी भी मारे गए थे. इस्माइल खतीब ईरान के खुफिया मंत्री थे. 18 मार्च को इजरायल के हमले में उनकी मौत हो गई थी. अगस्त 2021 में उन्होंने नागरिक खुफिया तंत्र का नेतृत्व संभाला था. इनके अलावा आईआरजीसी के कमांडर इन चीफ मोहम्मद पाकपुर की 28 फरवरी को तेहरान में हुए हमले में मौत हो गई थी. इसके अलावा वायुसेना अधिकारी अजीज नासिरजादेह 28 फरवरी को तेहरान के हमले में मारे गए. ईरान सशस्त्र बल के चीफ ऑफ स्टाफ अब्दुल रहीम मौसवी 28 फरवरी के हमले में मारे गए. बासिज अर्धसैनिक बल के कमांडर घोलमरेजा सुलेमानी 17 मार्च को हुए हमले में मारे गए. रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के नौसेना खुफिया प्रमुख बेहनम रजाई 26 मार्च को बंदर अब्बास के बंदरगाह शहर में हमले के दौरान मारे गए.
US Iran conflict: मिडिल ईस्ट में जारी जंग को लेकर अमेरिका ने संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान ज्यादा लंबा नहीं चलेगा. US Iran conflict: मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच अमेरिका ने पहली बार साफ संकेत दिया है कि ईरान के खिलाफ उसका सैन्य अभियान ज्यादा लंबा नहीं चलेगा. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि यह ऑपरेशन “महीनों नहीं, बल्कि हफ्तों” में खत्म हो सकता है और इसके लिए जमीनी सेना उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी. फ्रांस में जी7 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद रुबियो ने कहा कि अमेरिका अपने तय लक्ष्यों को समय से पहले या उसके आसपास हासिल कर सकता है. हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि कुछ अमेरिकी सैनिकों को इलाके में तैनात किया जा रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर विकल्प खुले रहें. मरीन और एयरबोर्न सैनिकों की तैनाती शुरू अमेरिकी विदेश मंत्री ने भले ही जमीनी युद्ध से इनकार किया हो, लेकिन पेंटागन ने हजारों मरीन और एयरबोर्न सैनिकों को मिडिल ईस्ट भेजना शुरू कर दिया है. जानकारी के मुताबिक, सैनिकों का पहला दल इसी मार्च के अंत तक एक बड़े एम्फीबियस जहाज के जरिए पहुंचने वाला है. इससे यह आशंका बढ़ गई है कि अगर हालात बिगड़े तो जंग जमीनी स्तर तक फैल सकती है. ट्रंप का अल्टीमेटम, 10 दिन की डेडलाइन इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस जंग को जल्द खत्म करने के संकेत दे रहे हैं. उन्होंने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने के लिए 10 दिन की नई समय सीमा दी है. साथ ही चेतावनी दी है कि ऐसा न होने पर ऊर्जा ढांचे पर हमला किया जा सकता है. ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के जरिए ईरान को 15 सूत्रीय प्रस्ताव भी भेजा है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन रोकने और मिसाइल कार्यक्रम सीमित करने जैसी शर्तें शामिल हैं. ईरान ने बातचीत से किया इनकार हालांकि तेहरान ने अब तक इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया है. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि हमलों के बीच बातचीत करना अस्वीकार्य है और ईरान इसका भारी जवाब देगा. इस जंग का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. ईरान में अब तक 1900 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 20 हजार से अधिक लोग घायल हो चुके हैं. वहीं अमेरिका के 300 से ज्यादा सैनिक घायल हुए हैं और 13 की मौत हो चुकी है.
Israel Iran War: एडमिरल कूपर ने कहा कि कुछ ही घंटे पहले 10,000वां ईरानी लक्ष्य भी निशाना बनाया गया. उन्होंने बताया कि अमेरिका और उसके सहयोगी इजरायल ने मिलकर हजारों अतिरिक्त ठिकानों पर हमले किए हैं. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख ब्रैड कूपर ने दावा किया है कि युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिकी सेना ने ईरान में 10,000 से अधिक लक्ष्यों पर हमले किए हैं. इन हमलों में ईरान की दो-तिहाई हथियार फैक्ट्रियों को नष्ट कर दिया गया है. 10,000वां लक्ष्य भी किया तबाह एडमिरल कूपर ने कहा कि कुछ ही घंटे पहले 10,000वां ईरानी लक्ष्य भी निशाना बनाया गया. उन्होंने बताया कि अमेरिका और उसके सहयोगी इजरायल ने मिलकर हजारों अतिरिक्त ठिकानों पर हमले किए हैं, जिससे उनकी संयुक्त ताकत साफ नजर आती है. नौसेना को भारी नुकसान कूपर के अनुसार, ईरान की नौसेना को बड़ा झटका लगा है. उन्होंने दावा किया कि ईरानी नौसेना के 92% बड़े जहाज नष्ट कर दिए गए हैं, जिससे उसकी समुद्री ताकत और क्षेत्र में प्रभाव काफी हद तक खत्म हो गया है. मिसाइल और ड्रोन हमलों में गिरावट उन्होंने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों में 90% की कमी आई है, जो इन सैन्य कार्रवाइयों के असर को दिखाता है. कूपर ने बताया कि ईरान के मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक प्रोडक्शन से जुड़े दो-तिहाई से ज्यादा कारखाने और शिपयार्ड या तो क्षतिग्रस्त हो चुके हैं या पूरी तरह नष्ट कर दिए गए हैं. आगे भी जारी रहेंगे हमले उन्होंने कहा कि अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है और अमेरिका ईरान की पूरी आर्म्ड प्रोडक्शन सिस्टम को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
US Israel Iran War: अमेरिका और ईरान की जंग कई देशों में फैल गई है, जिसका सबसे ज्यादा असर लेबनान पर हो रहा है. इजरायल ने दावा किया है कि वह लेबनान के 10 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लेगा. 📰 इजरायल का बड़ा ऐलान: लिटानी नदी तक कब्जे की योजना, लेबनान में बढ़ेगा तनाव मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंचता नजर आ रहा है। इजरायल काट्ज के ताजा बयान ने इस क्षेत्र में संभावित बड़े सैन्य टकराव की आशंका को और बढ़ा दिया है। इजरायली रक्षा मंत्री ने साफ तौर पर कहा है कि इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में लिटानी नदी तक कब्जा कर एक मजबूत बफर जोन बनाएगी। यह बयान न सिर्फ सैन्य रणनीति का संकेत है बल्कि यह बताता है कि इजरायल अब सीमित कार्रवाई से आगे बढ़कर दीर्घकालिक नियंत्रण की दिशा में सोच रहा है। 🔍 क्या है पूरा मामला? रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने कहा कि इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान के उस इलाके तक जाएगी जहां तक लिटानी नदी बहती है। यह नदी इजरायल की उत्तरी सीमा से करीब 30 किलोमीटर अंदर स्थित है और यह इलाका लेबनान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 10% हिस्सा कवर करता है। काट्ज के अनुसार, सेना इस क्षेत्र में मौजूद सभी पुलों और रणनीतिक स्थानों को अपने नियंत्रण में लेगी। उन्होंने यह भी कहा कि जहां “आतंकवाद” मौजूद है, वहां नागरिकों को रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ⚔️ बफर जोन क्या होता है और क्यों जरूरी? बफर जोन एक ऐसा क्षेत्र होता है जिसे सैन्य दृष्टि से खाली कराया जाता है ताकि दो देशों या संघर्षरत पक्षों के बीच सीधा टकराव कम हो सके। इजरायल की इस योजना के पीछे मुख्य उद्देश्य है: उत्तरी इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना सीमा पर हमलों को रोकना दुश्मन संगठनों को दूर रखना इजरायल लंबे समय से दक्षिणी लेबनान में सक्रिय समूहों को अपने लिए खतरा मानता रहा है। 🚨 क्या यह स्थायी कब्जे की तैयारी है? विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान बेहद अहम है क्योंकि पहली बार इजरायल ने खुले तौर पर इतने बड़े क्षेत्र पर लंबे समय तक नियंत्रण रखने की बात कही है। इससे पहले इजरायल अक्सर सीमित सैन्य कार्रवाई करता था, लेकिन इस बार: क्षेत्रीय नियंत्रण की स्पष्ट योजना सामने आई है नागरिकों की वापसी को सुरक्षा से जोड़ा गया है सैन्य उपस्थिति को लंबा करने के संकेत दिए गए हैं 🏠 नागरिकों पर क्या होगा असर? काट्ज के बयान के अनुसार, दक्षिणी लेबनान से लाखों लोग पहले ही विस्थापित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि ये लोग तब तक अपने घर नहीं लौट पाएंगे जब तक इजरायल की उत्तरी सीमा पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाती। इसका मतलब: बड़े पैमाने पर विस्थापन जारी रहेगा मानवीय संकट गहरा सकता है शरणार्थियों की संख्या बढ़ सकती है 🌍 क्षेत्रीय राजनीति पर असर मध्य पूर्व पहले से ही तनावग्रस्त क्षेत्र है। ऐसे में इजरायल का यह कदम कई देशों को प्रभावित कर सकता है: 1. लेबनान की प्रतिक्रिया लेबनान इस कदम को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मान सकता है। 2. अंतरराष्ट्रीय दबाव संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठन इस मुद्दे पर हस्तक्षेप कर सकते हैं। 3. अन्य देशों की भूमिका ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां इस मामले में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो सकती हैं। 📊 रणनीतिक महत्व: लिटानी नदी क्यों अहम है? लिटानी नदी सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि एक रणनीतिक रेखा है: यह प्राकृतिक बाधा का काम करती है सैन्य दृष्टि से रक्षा को आसान बनाती है इसके पार नियंत्रण का मतलब गहराई तक सुरक्षा इजरायल के लिए यह एक “डिफेंस लाइन” की तरह है। 🔥 क्या बढ़ सकता है युद्ध का खतरा? इस बयान के बाद कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि: संघर्ष बड़े युद्ध में बदल सकता है सीमा पर झड़पें तेज हो सकती हैं नागरिकों की स्थिति और खराब हो सकती है
अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध का आज 24वां दिन हैं। ईरान ने सोमवार को मिसाइल पर स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज का बयान लिखकर इजराइल पर हमला किया। यह मैसेज इसलिए लिखा गया था क्योंकि हाल ही में सांचेज ने कहा था कि स्पेन की पॉलिसी 'युद्ध के खिलाफ' है। उन्होंने अमेरिका-इजराइल हमलों को 'गैरकानूनी' और 'खतरनाक' बताया था। ईरान ने उनके इसी बयान को मिसाइलों पर लिखकर एक तरह से दुनिया को संदेश देने की कोशिश की। जब ये मिसाइलें छोड़ी गईं, तब सैनिक नारे भी लगा रहे थे। दावा- सीजफायर के लिए ईरान की 3 और शर्तें ईरान ने सीजफायर के लिए 3 नई शर्तें रखीं हैं। ईरान के एक बड़े अधिकारी ने लेबनानी मीडिया अल मयादीन से रविवार को कहा कि उनका देश पहले से तय योजना के हिसाब से काम कर रहा है। ईरान की तीन नई शर्त- इलाके में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद किया जाए, होर्मुज स्ट्रेट के लिए नए नियम बनाए जाएं और ईरान के खिलाफ माने जाने वाले मीडिया से जुड़े लोगों पर कार्रवाई की जाए और उनका प्रत्यर्पण किया जाए। जबकि इससे पहले ईरान कहा था कि सीजफायर के लिए भविष्य में दोबारा युद्ध न होने की गारंटी दी जाए, नुकसान का मुआवजा दिया जाए और पूरे क्षेत्र में चल रहे युद्ध खत्म किए जाएं। ईरानी अधिकारी का कहना है कि उनका देश तब तक कार्रवाई जारी रखेगा, जब तक दुश्मनों को सबक नहीं सिखा देता। ईरान जंग ग्लोबल से अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने ईरान जंग को दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा बताया है। उन्होंने कैनबरा में कहा कि अभी का हाल बहुत खराब है। यह ऐसा है जैसे एक साथ कई तेल और गैस का संकट एक साथ चल रहा है। उन्होंने साफ कहा कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो दुनिया का कोई भी देश इससे बच नहीं पाएगा। इस लड़ाई में कई तेल और गैस से जुड़े ठिकानों पर हमले हुए हैं, जिससे सप्लाई पर असर पड़ा है। ईरान जंग से जुड़ी 3 तस्वीरें… ईरान ने रविवार रात इजराइल पर कई क्लस्टर बम दागे। अमेरिका ने रविवार को एयरस्ट्राइक कर कई ईरानी ड्रोन्स को तबाह किया। इजराइल ने रविवार को लेबनान के लितानी नदी पर मौजूद अल-कासमिया ब्रिज को उड़ा दिया। इसकी वजह से दक्षिणी लेबनान का उत्तरी लेबनान से संपर्क टूट गया।
यूपी के चंदौली में बनौली खुर्द के पास बन रहे आरओबी की ढलाई के दौरान बड़ा हादसा हो गया, जहां पूरा स्लैब अचानक जमींदोज हो गया. राहत की बात रही कि मजदूर बाल-बाल बच गए. मामले में डीएम ने कड़ी कार्रवाई करते हुए सेतु निगम पर FIR दर्ज कराई है. Uttar Pradesh News: चंदौली जिले के सदर तहसील अंतर्गत बनौली खुर्द गांव में बुधवार देर रात निर्माणाधीन रेलवे ओवरब्रिज (ROB) का स्लैब ढलाई के दौरान गिर गया. पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन-गया रेल रूट पर सेतु निगम द्वारा कराए जा रहे इस निर्माण कार्य के समय अचानक शटरिंग डिसबैलेंस होने से पूरा ढांचा ढह गया. घटना के वक्त वहां मौजूद मजदूर खतरे को भांपकर भाग निकले, जिससे कोई जनहानि नहीं हुई. अब जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग और एसपी आदित्य लांगहे ने मौके का निरीक्षण कर सेतु निगम के खिलाफ एफआईआर, जेई को सस्पेंड और प्रोजेक्ट मैनेजर पर विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं. लापरवाही पर डीएम का हंटर, FIR के आदेश हादसे की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ने सख्त रुख अपनाया है. उन्होंने कार्यदायी संस्था सेतु निगम के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने के साथ ही संबंधित जेई को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है. इसके अलावा प्रोजेक्ट मैनेजर और एई के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है. डीएम ने इस पूरे प्रकरण की तकनीकी जांच पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर से कराने के निर्देश दिए हैं ताकि भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सके. मजदूरों की सूझबूझ से टला बड़ा हादसा ठेकेदार प्रदीप कुमार के अनुसार, रात में ढलाई के दौरान नीचे लगी शटरिंग अचानक बैठ गई. पास के खेतों में पानी भरे होने के कारण जमीन नरम हो गई थी, जिससे शटरिंग का संतुलन बिगड़ गया. जब स्लैब धीरे-धीरे नीचे आने लगा, तो वहां काम कर रहे मजदूरों ने देख लिया और तुरंत वहां से भाग खड़े हुए. इस वजह से एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया. हालांकि, इस घटना ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विपक्ष ने सरकार को घेरा, ट्वीट कर साधा निशाना इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत भी गरमा गई है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस ने इस हादसे की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर ट्वीट कर सरकार की कार्यप्रणाली पर निशाना साधा है. विपक्ष ने निर्माणाधीन पुल के गिरने को भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण का नमूना बताया है. फिलहाल, प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों पर और भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी ताकि जनता की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.
बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका को ईरान के साथ जंग में घसीटने के आरोपों पर कहा, 'क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कोई बता सकता है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं? 🔴 पूरी खबर का विस्तृत विश्लेषण इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि ईरान के साथ चल रहा संघर्ष लोगों की अपेक्षा से कहीं ज्यादा जल्दी समाप्त हो सकता है। उनका कहना है कि इजरायल इस जंग में बढ़त बना चुका है और ईरान की सैन्य तथा परमाणु क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है। उन्होंने विशेष रूप से यह दावा किया कि ईरान अब न तो यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) करने में सक्षम है और न ही बैलिस्टिक मिसाइल विकसित करने की स्थिति में है। यह बयान काफी बड़ा है, क्योंकि ईरान की परमाणु क्षमता ही इस पूरे संघर्ष का मुख्य कारण रही है। ⚡ ईरान की स्थिति पर सवाल नेतन्याहू ने यह भी कहा कि वर्तमान में यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान को कौन नियंत्रित कर रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि देश के अंदर नेतृत्व को लेकर अस्थिरता और संघर्ष की स्थिति हो सकती है। उन्होंने Mojtaba Khamenei का जिक्र करते हुए कहा कि उनके सार्वजनिक रूप से सामने न आने से यह संकेत मिलता है कि शीर्ष स्तर पर सत्ता संघर्ष चल रहा है। साथ ही, उन्होंने Ali Khamenei के बाद नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता की बात भी कही। 🔥 जमीनी स्तर पर कमजोरियां नेतन्याहू के अनुसार, ईरान में सिर्फ शीर्ष नेतृत्व ही नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर भी कई कमजोरियां दिखाई दे रही हैं। उन्होंने कहा कि इजरायल इन कमजोरियों का फायदा उठाकर जल्द से जल्द संघर्ष को समाप्त करना चाहता है। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि इजरायल केवल सैन्य कार्रवाई ही नहीं बल्कि रणनीतिक और खुफिया स्तर पर भी ईरान को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। 🇺🇸 अमेरिका की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में Donald Trump का भी महत्वपूर्ण जिक्र आया। नेतन्याहू ने उन आरोपों को खारिज किया जिनमें कहा जा रहा था कि इजरायल ने अमेरिका को इस युद्ध में खींचा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका अपने फैसले खुद लेता है और यह कहना गलत है कि इजरायल उसे नियंत्रित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों की सेना और खुफिया एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं। 💥 गैस और तेल संकट का असर यह संघर्ष ऐसे समय में हो रहा है जब पूरी दुनिया पहले से ही ऊर्जा संकट से जूझ रही है। मध्य-पूर्व दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैस उत्पादक क्षेत्र है, और यहां किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक बाजार को प्रभावित करता है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष ने तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ला दिया है। कई देशों को ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता सताने लगी है। 🚢 स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का महत्व नेतन्याहू ने Strait of Hormuz का भी जिक्र किया, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। यह रास्ता वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है। ईरान द्वारा इस मार्ग को बंद करने की धमकी को उन्होंने “ब्लैकमेल” बताया और कहा कि इजरायल इसे विफल कर देगा। यदि यह मार्ग बंद होता है, तो पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें आसमान छू सकती हैं और आर्थिक संकट गहरा सकता है। 🔥 कतर और गैस हब पर हमला नेतन्याहू ने यह भी खुलासा किया कि इजरायल ने ईरान के गैस क्षेत्र पर हमला किया था, जिसके जवाब में तेहरान ने कतर के गैस हब को निशाना बनाया। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकता है।
Iran Israel US War: इस्माइल खातिब उन अधिकारियों में शामिल थे जिनके सिर पर अमेरिका ने पिछले हफ्ते अमेरिका ने 10 मिलियन डॉलर का इनाम रखा था. इजरायल के रक्षा मंत्री बुधवार (18 मार्च 2026) दावा किया है कि IDF ने ईरान के इंटेलिजेंस मिनिस्टर इस्माइल खातिब को मार दिया है. उन्होंने कहा कि खतीब को रात भर चले हमले में मार गिराया गया. हालांकि इसे लेकर अभी तक ईरान की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. इस्माइल खातिब की मौत इजरायल की ओर से ईरान के शक्तिशाली राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी और आईआरजीसी के बासिज अर्धसैनिक बल के प्रमुख की हत्या की पुष्टि के बाद हुई है. इस्माइल खातिब के सिर अमेरिका ने रखा था इनाम न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इजरायल के रक्षामंत्री इजराइल कार्ट्ज ने कहा कि उन्होंने और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सेना को बिना किसी अतिरिक्त अनुमति के किसी भी अन्य वरिष्ठ ईरानी अधिकारी को निशाना बनाकर मारने का अधिकार दे दिया है. खतीब उन अधिकारियों में शामिल थे जिनके बारे में अमेरिका पिछले हफ्ते जानकारी जुटा रहा था और उनका पता बताने वाले को 10 मिलियन डॉलर तक का इनाम देने की पेशकश की थी. इस बीच इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) ने तेहरान में रिवोल्यूशनरी गार्ड यूनिट, सुरक्षा बलों के लिए आपूर्ति केंद्र और मिसाइल सिस्टम पर हमला किया है. इस हमले में कई लोग मारे गए और घायल हुए हैं. इजरायली वायु सेना ने कहा कि उन्होंने तेहरान में कमांड सेंटर और मिसाइल सिस्टम को निशाना बनाया है. ईरान के टॉप लीडरशिप को निशाना बना रहा इजरायल ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने इससे पहले पुष्टि की थी कि उसके सचिव अली लारीजानी इजरायली हमले में मारे गए हैं. ईरान की तस्नीम न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, एक बयान में काउंसिल ने कहा कि लारीजानी की मौत मंगलवार (17 मार्च 2026) सुबह हुई. उनके साथ उनके बेटे मोर्तेजा लारीजानी, काउंसिल के सचिवालय में सुरक्षा मामलों के उप-प्रमुख अलीरेजा बायात और कई अन्य लोग भी मारे गए. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि IDF ने ईरान पर चल रहे हमलों में लारीजानी को मार गिराया है. इस बीच, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने मंगलवार को पुष्टि की थी कि बसीज स्वयंसेवक बल के प्रमुख घोलमरेजा सोलेमानी की मौत अमेरिका-इजरायल के एक हमले में हुई है.
US Israel Iran War: इजरायल के रक्षा मंत्री काट्ज ने दावा किया है कि IDF के हमले में लारीजानी की मौत हो गई.दूसरी तरफ लरिजानी के ऑफिस ने कहा कि थोड़ी देर में वह प्रेस को संबोधित करेंगे. मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। Israel Defense Forces (IDF) ने 17 मार्च 2026 को दावा किया कि उसने ईरान के दो बड़े सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों—Ali Larijani और Gholam Reza Soleimani—को निशाना बनाया है। इस हमले ने न केवल क्षेत्रीय राजनीति बल्कि वैश्विक सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। IDF के अनुसार, बासिज बल के कमांडर गुलाम रजा सुलेमानी की इस हमले में मौत हो गई है। हालांकि, अली लारिजानी को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। इजरायल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने दावा किया है कि लारिजानी भी इस हमले में मारे गए, लेकिन ईरान की ओर से इसकी पुष्टि नहीं की गई है। लारिजानी के कार्यालय ने संकेत दिया है कि वे जल्द ही मीडिया को संबोधित कर सकते हैं, जिससे स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। 🔥 ईरान के सत्ता केंद्र में हलचल Ali Larijani ईरान की राजनीति और सुरक्षा ढांचे में बेहद अहम भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें Ali Khamenei के सबसे करीबी सहयोगियों में गिना जाता था। खामेनेई की कथित मौत के बाद, लारिजानी को ईरान के सबसे प्रभावशाली नेताओं में देखा जा रहा था। लारिजानी का राजनीतिक करियर लंबा और प्रभावशाली रहा है—वे संसद के स्पीकर रह चुके हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में प्रमुख भूमिका निभा चुके हैं। ऐसे में उन पर हमला ईरान के सत्ता ढांचे को सीधे चुनौती देने जैसा माना जा रहा है। 💣 हमले का व्यापक असर इस हमले के कई स्तरों पर असर पड़ सकते हैं: 1. सैन्य नेतृत्व पर सीधा प्रहार Gholam Reza Soleimani की मौत ईरान की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा झटका है। बासिज बल देश के भीतर व्यवस्था बनाए रखने और आपात स्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 2. राजनीतिक अस्थिरता यदि लारिजानी की मौत की पुष्टि होती है, तो यह ईरान में नेतृत्व संकट को और गहरा कर सकता है। 3. क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि इजरायल और ईरान के बीच पहले से चल रहा संघर्ष अब खुली सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है। 🇺🇸 ट्रंप पर लारिजानी का बयान हमले से पहले, ईरानी सरकारी मीडिया ने Ali Larijani का एक बयान जारी किया था जिसमें उन्होंने Donald Trump की कड़ी आलोचना की थी। लारिजानी ने कहा कि जिस तरह 1979 की Iranian Revolution के समय जनता के विरोध को झूठा बताया गया था, उसी तरह आज अमेरिका ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को “AI जनित” बता रहा है। यह बयान दर्शाता है कि ईरान की राजनीतिक नेतृत्व अमेरिका और इजरायल के खिलाफ कितनी तीखी प्रतिक्रिया दे रहा था। 🌍 मुस्लिम देशों से नाराजगी हाल के घटनाक्रमों में Ali Larijani ने मुस्लिम देशों की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि जब ईरान पर इजरायल और अमेरिका ने हमला किया, तब अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। उनके अनुसार, यह हमला “धोखे से” किया गया और इसका उद्देश्य ईरान को कमजोर करना था। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस हमले में कई सैन्य कमांडर, नागरिक और इस्लामी क्रांति से जुड़े प्रमुख नेता मारे गए।
North Korea Missile Attack On Japan: यह प्रोजेक्टाइल परीक्षण ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच 9 मार्च से 19 मार्च तक वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास चल रहा है. उत्तर कोरिया ने शनिवार को एक संदिग्ध बैलिस्टिक प्रोजेक्टाइल दागकर एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. यह प्रक्षेपण ऐसे समय हुआ है जब कुछ दिन पहले ही देश के नेता किम जोंग उन ने अपने नए युद्धपोत से क्रूज प्रोजेक्टाइल परीक्षण की निगरानी की थी. इस कदम को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है. जापान के समुद्री क्षेत्र के पास गिरी प्रोजेक्टाइल जापान के कोस्ट गार्ड के अनुसार दागा गया संदिग्ध बैलिस्टिक प्रोजेक्टाइल समुद्र में गिर गया. जापान के सार्वजनिक प्रसारक एनएचके ने रक्षा मंत्रालय के एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से बताया कि प्रोजेक्टाइल देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के बाहर समुद्री क्षेत्र में गिरी. अमेरिका-दक्षिण कोरिया सैन्य अभ्यास के बीच प्रक्षेपण यह प्रोजेक्टाइल परीक्षण ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच 9 मार्च से 19 मार्च तक वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास चल रहा है. उत्तर कोरिया लंबे समय से इन अभ्यासों का विरोध करता रहा है और इन्हें अपने खिलाफ युद्ध की तैयारी करार देता है. परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता की मांग हाल ही में प्योंगयांग ने अमेरिका से उसे परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता देने की मांग की थी. यह मांग पांच साल में पहली बार आयोजित सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी की कांग्रेस के दौरान उठाई गई थी, जिसमें देश की सुरक्षा और परमाणु नीति पर भी चर्चा हुई. ईरान पर अमेरिकी हमले की आलोचना उत्तर कोरिया ने हाल ही में ईरान पर अमेरिका के हमले की भी कड़ी आलोचना की है. प्योंगयांग ने इस कार्रवाई को अमेरिका का 'बेशर्म' कदम बताते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी निंदा की.
पाकिस्तान ने गुरुवार रात अफगानिस्तान के कई इलाकों में हवाई हमले किए। रॉयटर्स के मुताबिक, काबुल में घरों पर हुई बमबारी में 4 लोगों की मौत और 15 घायल हो गए। इसमें महिलाएं और बच्चे शामिल है। हमलों में कई घर भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। वहीं, तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद के मुताबिक, यह हमला प्राइवेट एयरलाइन 'काम एयर' के फ्यूल डिपो पर किया गया, जो सिविलियन विमानों और UN के विमानों को भी फ्यूल सप्लाई करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस हमले का जवाब दिया जाएगा। पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि यह कार्रवाई पाकिस्तानी तालिबान (TTP) के ठिकानों पर की गई है। पाकिस्तान का कहना है कि हाल के महीनों में देश में बढ़ते आतंकी हमलों के बाद यह ऑपरेशन शुरू किया गया। काबुल में शुक्रवार की रात पाकिस्तानी हवाई हमले में क्षतिग्रस्त हुए एक घर के बाहर घायल अफगान नागरिक बैठे हुए। पाकिस्तान ने तालिबान नेताओं के गढ़ को निशाना बनाया तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि पाकिस्तानी हमले कंधार और पक्तिका प्रांतों में भी किए गए। कंधार तालिबान नेताओं का गढ़ माना जाता है। वहीं, तालिबान सरकार ने पाकिस्तान के आरोपों को खारिज कर दिया है। उसका कहना है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ हमलों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। दरअसल, पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर दबाव बनाता रहा है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी भी आतंकी संगठन को न करने दे। इस्लामाबाद का आरोप है कि TTP अफगानिस्तान से ऑपरेट हो रहा है, जबकि तालिबान सरकार इन आरोपों से लगातार इनकार करती रही है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच जंग जैसे हालात पाकिस्तान और अफगानिस्तान में संघर्ष की शुरुआत 22 फरवरी को हुई थी। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में एयरस्ट्राइक की थी। पाकिस्तान के उप गृह मंत्री तलाल चौधरी ने दावा किया था कि सीमावर्ती इलाकों में TTP के ठिकानों पर कार्रवाई में कम से कम 70 लड़ाके मारे गए। बाद में पाकिस्तानी अखबार डॉन ने यह संख्या 80 तक पहुंचने का दावा किया था। इसके जवाब में अफगानिस्तान ने 27 फरवरी को पाकिस्तान पर हमला किया। अफगान रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि पाकिस्तान को 'सही समय पर कड़ा जवाब' दिया जाएगा। मंत्रालय ने इन हमलों को देश की संप्रभुता का उल्लंघन बताया था। पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर दबाव बनाता रहा है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी भी आतंकी संगठन को न करने दे। इस्लामाबाद का आरोप है कि TTP अफगानिस्तान से ऑपरेट हो रहा है, जबकि तालिबान सरकार इन आरोपों से लगातार इनकार करती रही है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में 415 तालिबान लड़ाके मारे पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ हमले को ‘गजब लिल हक’ ऑपरेशन नाम दिया था और काबुल समेत कई प्रांतों में हमले किए। ‘गजब लिल हक’ का मतलब है, अपने हक के लिए खड़े होना। पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ता उल्लाह तारर के मुताबिक अब तक - 415 तालिबान लड़ाके मारे गए 580 से ज्यादा घायल हुए 182 पोस्ट तबाह की गईं 31 पोस्ट पर कब्जा किया गया 185 टैंक और सैन्य वाहन तबाह किए गए पाकिस्तानी वायुसेना ने दावा किया था कि उसने नंगरहार और कंधार में तालिबान के सैन्य मुख्यालयों को निशाना बनाया। वहीं तालिबान का कहना है कि उसके सिर्फ 8 से 13 लड़ाके मारे गए और कुछ घायल हुए। उसने दावा किया था कि 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और दो सैन्य मुख्यालयों समेत कई चौकियों पर कब्जा किया गया। 1 लाख लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए पिछले कुछ हफ्तों में अफगान और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच सीमा पर कई बार झड़पें हो चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र के अफगानिस्तान मिशन (UNAMA) के अनुसार 26 फरवरी से 5 मार्च के बीच पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाइयों में 56 नागरिक मारे गए हैं। इनमें 24 बच्चे भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक इन हमलों के कारण करीब 1.15 लाख लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाने को मजबूर हुए हैं। पाकिस्तान और TTP में लड़ाई क्यों? 2001 में अमेरिका के अफगानिस्तान पर हमले के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ दिया। इससे TTP नाराज हो गया, वह इसे इस्लाम के खिलाफ मानता था। TTP का मानना है कि पाकिस्तान सरकार सच्चा इस्लाम नहीं मानती है, इसलिए वो उसके खिलाफ हमला करता है। TTP का अफगान तालिबान के साथ गहरा जुड़ाव है। दोनों समूह एक-दूसरे को समर्थन देते हैं। 2021 में अफगान तालिबान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान ने TTP को निशाना बनाकर अफगानिस्तान में हमले किए। ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में पाकिस्तान दूसरे नंबर पर ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2025 के मुताबिक, बुर्किना फासो के बाद पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे आतंक प्रभावित देश बन चुका है, जबकि 2024 में यह चौथे स्थान पर था। TTP के हमलों में 90% की वृद्धि हुई है। बलूच आर्मी (BLA) के हमलों में 60% बढ़ोतरी हुई है। इस्लामिक स्टेट- खुरासान (IS-K) ने अब पाकिस्तानी शहरों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। दोनों देशों के बीच पहले भी हुआ है तनाव अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड लाइन को लेकर लंबे समय से विवाद है। दोनों देश एक-दूसरे पर हमले और आतंकियों को छिपाने का आरोप लगाते रहते हैं। 2021 में अफगानिस्तान हुकूमत पर तालिबान के कंट्रोल के बाद से तनाव और बढ़ गया है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान में जंग के हालात:PAK बोला- 274 अफगान लड़ाके मारे, 400 से ज्यादा घायल, तालिबान हमलों के पीछे भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हालात जंग जैसे हो गए हैं। पाकिस्तान एयरफोर्स ने अफगानिस्तान के कई इलाकों में फिर से एयरस्ट्राइक की है। वहीं तालिबान ने दावा किया है कि उसने इस्लामाबाद के फैजाबाद सैन्य ठिकाने समेत कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया।
Dubai Airport Drone Attack: अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग में दुबई भी जल रहा है. कुछ देर पहले दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास ड्रोन हमला हुआ है. इसमें 4 लोग घायल हो गए, जिसमे एक भारतीय भी शामिल है. ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग के बीच दुबई में बड़ा हादसा हुआ है. दुबई मीडिया ऑफिस ने आधिकारिक तौर पर कन्फर्म किया है कि कुछ देर पहले दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (DXB) के आसपास दो ड्रोन गिरे. इस हादसे में चार लोग घायल हुए हैं. दो घानाई नागरिकों और एक बांग्लादेशी नागरिक और एक भारतीय नागरिक को मामूली चोटें आईं हैं. ड्रोन-मिसाइल अटैक से सिक्योरिटी हाई अलर्ट अभी तक ये साफ नहीं हुआ है कि ड्रोन ईरान से आए थे या किसी और वजह से गिरे, लेकिन जंग के चलते इलाके में ईरानी ड्रोन और मिसाइल अटैक्स की वजह से सिक्योरिटी अलर्ट बहुत हाई है. UAE के एयर डिफेंस सिस्टम ने पिछले कुछ घंटों में कई ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया है. दुबई एयरपोर्ट दुनिया का सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक है, लेकिन अभी फ्लाइट्स पूरी तरह सामान्य चल रही हैं और कोई बड़ा डिसरप्शन नहीं हुआ है. खाड़ी देशों में ईरान के हमले बढ़े ये घटना ऐसे समय पर हुई है जब ईरान ने गल्फ देशों यानी UAE, सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत पर काउंटर अटैक्स तेज कर दिए हैं. अबू धाबी के रुवैस रिफाइनरी में भी ड्रोन हमले से आग लगी थी और उसे बंद करना पड़ा था. भारत सरकार और भारतीय दूतावास दुबई में घायल भारतीय नागरिक की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरी मदद पहुंचाने की तैयारी में हैं. ये अटैक्स जंग शुरू होने यानी 28 फरवरी 2026 से अब तक जारी हैं. ईरान ने गल्फ देशों पर सैकड़ों मिसाइल-ड्रोन दागे हैं, जबकि UAE जैसे देशों ने ज्यादातर इंटरसेप्ट किए हैं. UAE में भारतीयों के लिए एडवाइजरी भारत सरकार ने UAE में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी भी जारी की है. दुबई और अबू धाबी में रहने वाले भारतीयों को अलर्ट रहने और लोकल अथॉरिटीज के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जा रही है. अगर कोई भारतीय नागरिक प्रभावित हुआ है, तो भारतीय दूतावास दुबई (+971-4-3971222) या अबू धाबी (+971-2-4492700) से संपर्क करें.
दावा- ट्रम्प ईरान के खार्ग आइलैंड पर कब्जा चाहते हैं:90% ईरानी तेल का एक्सपोर्ट यहां से, एक्सपर्ट बोले- इस पर हमले से विश्वयुद्ध तय अमेरिका, इजराइल और ईरान में जारी जंग के बीच होर्मुज स्ट्रेट के पास मौजूद खार्ग आइलैंड अचानक बेहद अहम हो गया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ट्रम्प सरकार इस आइलैंड पर कब्जे को लेकर सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहा है, क्योंकि यह ईरान की तेल कमाई का सबसे बड़ा सेंटर माना जाता है। दरअसल ईरान के करीब 80 से 90% कच्चे तेल का निर्यात इसी आइलैंड से होता है। यहां बड़े तेल टर्मिनल, पाइपलाइन, स्टोरेज टैंक और जहाजों में तेल भरने की फैसिलिटी मौजूद हैं। इस टर्मिनल से हर दिन करीब 70 लाख बैरल तक तेल जहाजों में भरा जा सकता है। 1960 के दशक में विदेशी निवेश के बाद इस जगह को बड़े ऑयल एक्सपोर्ट सेंटर के तौर पर डेवलप किया गया था और तब से यह ईरान की ऑयल सप्लाई की रीढ़ बन गया। हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल डोरान ने कहा कि ट्रम्प सरकार युद्ध के बाद की ईरानी अर्थव्यवस्था के आधार को तबाह नहीं करना चाहती है। यह एक लंबे समय से चली आ रही अमेरिकी रेड लाइन है। अगर यहां हमला हुआ तो ईरान बहुत बड़े पैमाने पर हमला कर सकते हैं, जिससे तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात बन जाएंगे। जंग के बीच भी जारी है तेल निर्यात अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों और न्यूक्लियर फैसिलिटी को निशाना बनाया है, लेकिन खार्ग आइलैंड को अब तक सीधे हमला करके निशाना नहीं बनाया गया। सैटेलाइट डेटा और जहाजों की निगरानी करने वाली कंपनियों के मुताबिक युद्ध के बावजूद ईरान यहां से लगातार तेल निर्यात कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 28 फरवरी से अब तक करीब 1.2 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल टैंकरों के जरिए बाहर भेजा गया है। असली आंकड़ा इससे ज्यादा भी हो सकता है क्योंकि ईरान के कई जहाज अपनी ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके चलते हैं। डार्क फ्लीट से भेजा जा रहा तेल ईरान कई बार ऐसे टैंकरों का इस्तेमाल करता है जिन्हें डार्क फ्लीट कहा जाता है। ये जहाज अपनी लोकेशन दिखाने वाली ट्रैकिंग मशीन बंद कर देते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। खार्ग आइलैंड फारस की खाड़ी में ईरान के तट से करीब 25 से 30 किलोमीटर दूर स्थित है। हाल ही में एक बड़ा तेल टैंकर होर्मुज स्ट्रेट पार करते समय कुछ समय के लिए ट्रैकिंग से गायब हो गया था और बाद में फिर दिखाई दिया। रिपोर्ट्स में कहा गया कि वह जहाज एशिया की ओर जा रहा था । खार्ग आइलैंड के पास दुनिया के अहम तेल रास्ते खार्ग आइलैंड स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बेहद करीब है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर इस इलाके में हमला होता है या जहाजों की आवाजाही रुकती है तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि अगर खार्ग आइलैंड के तेल टर्मिनल को तबाह कर दिया जाए या उस पर कब्जा कर लिया जाए, तो ईरान की सबसे बड़ी आय बंद हो सकती है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि तेल की बिक्री से मिलने वाला पैसा ईरान की सरकार और उसकी सैन्य ताकत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है। अगर यह कमाई रुक जाती है तो ईरान के लिए लंबे समय तक युद्ध जारी रखना मुश्किल हो सकता है। हमला हुआ तो क्या असर होगा एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर खार्ग आइलैंड पर हमला हुआ तो इसके दो बड़े असर हो सकते हैं: ईरान की तेल से होने वाली कमाई अचानक गिर सकती है दुनिया भर में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं कुछ अनुमानों के मुताबिक अगर यहां से सप्लाई रुकती है तो तेल की कीमत प्रति बैरल करीब 10 डॉलर तक बढ़ सकती है। ईरान की तेल उत्पादन क्षमता इस समय ईरान करीब 33 लाख बैरल कच्चा तेल का प्रोडक्शन करता है। इसके अलावा लगभग 13 लाख बैरल कंडेन्सेट और अन्य लिक्विड ईंधन का भी प्रोडक्शन करता है है। इस तरह कुल ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का 4.5% हिस्सा ईरान से आता है। ईरान के बड़े तेल क्षेत्र जैसे अहवाज, मरून और गचसरान से पाइपलाइन सीधे खार्ग आइलैंड तक आती हैं। यहां तेल को बड़े स्टोरेज टैंकों में रखा जाता है और फिर टैंकर जहाजों में भरकर दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा जाता है। आइलैंड पर करीब 3 करोड़ बैरल तेल स्टोर करने की क्षमता है। फिलहाल अनुमान है कि यहां लगभग 1.8 करोड़ बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, जो सामान्य हालात में 10 से 12 दिन के निर्यात के बराबर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जंग शुरू होने से ठीक पहले ईरान ने खार्ग आइलैंड से ऑयल एक्सपोर्ट तेजी से बढ़ा दिया था। 15 से 20 फरवरी के बीच तेल निर्यात 30 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा हो गया था, जो नॉर्मल लेवल से लगभग तीन गुना था। माना जा रहा है कि ईरान ने युद्ध शुरू होने से पहले ज्यादा से ज्यादा तेल बाहर भेजने की कोशिश की। ईरान-इराक वॉर में इस आइलैंड पर हमला हुआ था खार्ग आइलैंड पहले भी कई बार रणनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। 1979 के ईरान बंधक संकट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को सलाह दी गई थी कि इस आइलैंड पर कब्जा कर लिया जाए, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 1980 के दशक में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय अमेरिका ने ईरान की कुछ अन्य तेल सुविधाओं पर हमला किया था, लेकिन खार्ग आइलैंड को निशाना नहीं बनाया गया। हालांकि ईरान-इराक वॉर के दौरान इराकी हमलों में इस आइलैंड के तेल टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचा था, लेकिन बाद में ईरान ने इसे दोबारा बना लिया। अभी तक हमला क्यों नहीं किया गया एक्सपर्ट्स का कहना है कि खार्ग आइलैंड पर हमला करने से दुनिया भर के तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और खाड़ी क्षेत्र में युद्ध और फैल सकता है। यही वजह है कि अभी तक अमेरिका और उसके सहयोगी देश पहले ईरान की सैन्य और न्यूक्लियर कैपिसिटी को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसलिए फिलहाल यह छोटा सा आइलैंड सीधे युद्ध का मैदान नहीं बना है, लेकिन आने वाले समय में जंग की दिशा तय करने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है। ---------- यह खबर भी पढ़ें… ईरान बोला- इजराइल-अमेरिका के राजदूतों को निकाले:तभी होर्मुज स्ट्रेट से उनके जहाज गुजरने देंगे; टैक्स वसूलने की शर्त भी रखी अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग का 11वां दिन हैं। इस बीच ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों के गुजरने को लेकर एक नई शर्त रखी है। इजराइली मीडिया वाइनेट की रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की सेना इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि कुछ देशों के जहाजों को इस रास्ते से गुजरने दिया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उन देशों को पहले इजराइल और अमेरिका के राजदूतों को अपने देश से निकालना होगा।
इजराइल और अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव फैल गया है। इस जंग में ईरान, इजराइल,सऊदी, लेबनान, UAE जैसे मिडिल ईस्ट के कुल 12 देश शामिल हो चुके हैं। हालांकि जंग के 9 दिन बीत जाने के बाद भी अब तक यमन इससे दूर है। यमन में हूती विद्रोही रहते हैं जो कि ईरान के सहयोगी माने जाते हैं। अक्टूबर 2023 में गाजा जंग शुरू होने के बाद कई बार इजराइल और हूती विद्रोही एक-दूसरे पर हमला कर चुके हैं। पिछले साल जून में इजराइल और ईरान के बीच 12 दिन जंग चली थी, तब भी हूती विद्रोही इस जंग में शामिल थे। हालांकि इस बार 28 फरवरी से जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब से अब तक हूती विद्रोहियों ने ईरान का समर्थन केवल बयानों के जरिए ही किया है। हालांकि यह साफ नहीं है कि वे आगे भी इस जंग से दूर रहेंगे या नहीं। यमन में अभी तक इजराइल और अमेरिका के हमलों से बचा हुआ है। अमेरिका-इजराइल के हमले से बचना मकसद अल जजीरा के मुताबिक एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि हूती जंग में हिस्सा लेंगे। फिलहाल उनका इससे दूर रहना किसी रणनीति से जुड़ा हो सकता है। मिडिल ईस्ट मामलों पर नजर रखने वाले लुका नेवोला ने अल जजीरा से कहा कि हूती विद्रोहियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि अमेरिका और इजराइल की सीधी जवाबी कार्रवाई से बचा जाए। पिछले साल अगस्त में इजराइल ने यमन में हवाई हमले किए थे, जिनमें हूती सरकार के कम से कम 12 सीनियर मेंबर मारे गए थे। इनमें प्रधानमंत्री अहमद अल-रहावी और आर्मी चीफ मोहम्मद अल-घुमारी भी शामिल थे। यह हूती विद्रोहियों के लिए बहुत बड़ा नुकसान था। अमेरिका तथा इजराइल के साथ टकराव में उनकी सबसे बड़े नुकसान में से एक माना गया था। अहमद अल रहावी की मौत 28 अगस्त 2025 को सना (यमन) में इजराइली एयरस्ट्राइक में हुई थी। इजराइल के हमलों के बाद हूती विद्रोही सतर्क हुए इस घटना और पिछले साल हुए अन्य हमलों के बाद हूती लीडरशिप अब ज्यादा सतर्क हो गया है। उन्हें डर है कि अगर वे बड़ा कदम उठाते हैं तो उनके नियंत्रण वाले इलाकों पर भारी हवाई हमले हो सकते हैं। नेवोला के मुताबिक हूती विद्रोहियों को इजराइल की खुफिया क्षमता से भी डर है और उन्हें आशंका है कि उनकी टॉप लीडरशिप को निशाना बनाया जा सकता है। हालांकि पिछले साल के नुकसान के बावजूद हूती विद्रोही पूरी तरह कमजोर नहीं हुए हैं और वे अब भी अपने विरोधियों पर हमले करने की क्षमता रखते हैं। नेवोला के अनुसार अगर अमेरिका या इजराइल सीधे उन पर हमला करते हैं या यमन में उनके विरोधी गुट उनके खिलाफ फिर से सैन्य अभियान शुरू करते हैं, तो हूती फिर से हमले तेज कर सकते हैं। हूती विद्रोही बोले- जंग के लिए तैयार हैं हूती नेता अब्दुल मलिक अल-हूती ने इस सप्ताह कहा कि यमन ईरान और वहां की जनता के साथ मजबूती से खड़ा है। उन्होंने कहा कि उनके सैनिक युद्ध के लिए तैयार हैं और हालात के हिसाब से किसी भी समय सैन्य कार्रवाई शुरू की जा सकती है। यमनी राजनीतिक विश्लेषक सदाम अल-हुरैबी का कहना है कि अगर ईरान उनसे मदद मांगेगा तो हूती युद्ध में शामिल हो सकते हैं। उनके मुताबिक तेहरान फिलहाल अपने सभी विकल्प एक साथ इस्तेमाल नहीं करना चाहता और वह आने वाले समय के लिए हूती विद्रोहियों को एक अहम ताकत के रूप में बचाकर रखना चाहता है। अल-हुरैबी ने कहा कि अगर अमेरिका और इजराइल के हमले नहीं रुकते, तो हूती लंबे समय तक चुप नहीं बैठेंगे। उनके अनुसार सना और हूती विद्रोहियों के नियंत्रण वाले अन्य इलाकों में युद्ध की तैयारी चल रही है। हूती विद्रोहियों के पास रेड सी में फिर से अशांति फैलाने की क्षमता है। वे ड्रोन और मिसाइल के जरिए इजराइल पर भी हमला कर सकते हैं। अल-हुरैबी का कहना है कि ऐसा होना लगभग तय है, बस यह हूती विद्रोहियों और ईरान के तय समय पर निर्भर करेगा। हूती विद्रोहियों के पास कई लक्ष्यों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला करने की क्षमता है। नेवोला के अनुसार अगर युद्ध लंबा चलता है और हूती विद्रोहियों को सीधे खतरा महसूस होता है, तो वे अपने हमलों का दायरा बढ़ाकर इजराइल, अमेरिकी युद्धपोतों, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजराइल के सहयोगी देशों जैसे संUAE और सोमालिलैंड को भी निशाना बना सकते हैं। यमन में खामेनेई की मौत के बाद 1 मार्च को ईरान के समर्थन में रैली निकाली गई। इसमें खामेनेई की तस्वीर को चूमता एक युवक। जहाजों पर हमला कर सकते हैं हूती विद्रोही साल 2023 के आखिर से लेकर 2025 तक हूती विद्रोहियों ने रेड सी से गुजरने वाले जहाजों पर लगातार हमले किए थे। इस अभियान में कम से कम 9 नाविकों की मौत हुई और चार जहाज डूब गए। इससे रेड सी के ट्रेड पर बड़ा असर पड़ा, जहां से हर साल लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का सामान गुजरता था। अमेरिका और इजराइल के हालिया हमलों में ईरान के कई राजनीतिक और सैन्य नेताओं की भी मौत हुई है। अगर ईरानी शासन कमजोर पड़ता है या गिर जाता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान यमन के हूती विद्रोहियों को भी हो सकता है। अल-हुरैबी के अनुसार अगर ईरान कमजोर होता है, तो यमन तक पहुंचने वाले ईरानी हथियारों की तस्करी कम हो सकती है या पूरी तरह बंद हो सकती है। यह हूती विद्रोहियों के लिए बड़ी चुनौती होगी। संयुक्त राष्ट्र ने 2022 में कहा था कि अरब सागर में पकड़े गए हजारों हथियार शायद ईरान के एक ही बंदरगाह से भेजे गए थे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि रूस, चीन और ईरान में बने हथियार नावों और जमीन के रास्ते यमन में तस्करी करके पहुंचाए जाते थे। हालांकि ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है। कौन हैं हूती विद्रोही साल 2014 में यमन में गृह युद्ध शुरू हुआ। इसकी जड़ शिया-सुन्नी विवाद है। कार्नेजी मिडिल ईस्ट सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों समुदायों में हमेशा से विवाद था जो 2011 में अरब क्रांति की शुरुआत से गृह युद्ध में बदल गया। 2014 में शिया विद्रोहियों ने सुन्नी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस सरकार का नेतृत्व राष्ट्रपति अब्दरब्बू मंसूर हादी कर रहे थे। हादी ने अरब क्रांति के बाद लंबे समय से सत्ता पर काबिज पूर्व राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह से फरवरी 2012 में सत्ता छीनी थी। हादी देश में बदलाव के बीच स्थिरता लाने के लिए जूझ रहे थे। उसी समय सेना दो फाड़ हो गई और अलगाववादी हूती दक्षिण में लामबंद हो गए। अरब देशों में दबदबा बनाने की होड़ में ईरान और सऊदी अरब भी इस गृह युद्ध में कूद पड़े। एक तरफ हूती विद्रोहियों को शिया बहुल देश ईरान का समर्थन मिला। तो सरकार को सुन्नी बहुल देश सऊदी अरब का। देखते ही देखते हूती के नाम से मशहूर विद्रोहियों ने देश के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। 2015 में हालात ये हो गए थे कि विद्रोहियों ने पूरी सरकार को निर्वासन में जाने पर मजबूर कर दिया था।
MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे. Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है. रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे. गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.
UP News In Hindi: सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के शिक्षकों समेत लाखों को कर्मचारियों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान कर दिया है. इसके लिए सरकार की तरफ से आदेश जारी किया गया है होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह पर्व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को पड़ रही है। सामान्यतः सरकारी कर्मचारियों का वेतन महीने के अंतिम या अगले महीने के प्रारंभिक दिनों में जारी होता है, लेकिन इस बार त्योहार और अवकाश के कारण वेतन भुगतान की तिथि प्रभावित हो रही थी। रविवार (1 मार्च) को साप्ताहिक अवकाश तथा 2 मार्च को होलिका दहन होने के कारण नियमित प्रक्रिया से वेतन जारी करना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए शनिवार (28 फरवरी) को ही वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर त्वरित समन्वय और संवेदनशीलता को दर्शाता है। शिक्षा विभाग की भूमिका स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय की ओर से 2 मार्च से पहले वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। यह आदेश उत्तर प्रदेश स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारी और वित्तीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि होलिका दहन से पहले शिक्षकों और कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंच जाए। शिक्षा विभाग राज्य का एक बड़ा विभाग है, जिसमें बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, राजकीय इंटर कॉलेज, सहायता प्राप्त विद्यालय और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से पहले वेतन देने के लिए विभाग को वित्तीय और तकनीकी स्तर पर व्यापक तैयारी करनी पड़ी। ट्रेजरी, बैंकिंग प्रणाली और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर भुगतान प्रक्रिया को तेज किया गया। वित्त विभाग ने भी इस संबंध में शासनादेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया कि अवकाश के कारण नियमित तिथि पर वेतन भुगतान संभव नहीं था, इसलिए विशेष अनुमति के तहत अग्रिम भुगतान का निर्णय लिया गया है। इस फैसले को राज्यपाल Anandiben Patel की मंजूरी प्राप्त होने के बाद लागू किया गया। राज्यपाल की स्वीकृति का उल्लेख इस बात का संकेत है कि यह निर्णय केवल विभागीय स्तर का नहीं बल्कि उच्च प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है। इससे आदेश की वैधता और गंभीरता स्पष्ट होती है। प्रशासनिक समन्वय और कार्यान्वयन राज्य सरकार की ओर से सभी जिलाधिकारियों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने-अपने विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन 28 फरवरी तक हर हाल में जारी करें। साथ ही आदेश के पालन को लेकर सख्त हिदायत दी गई। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी को गंभीरता से लिया जाएगा। वेतन भुगतान की प्रक्रिया में निम्नलिखित स्तरों पर कार्य हुआ: वेतन बिलों की समयपूर्व तैयारी – संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) को समय से पहले वेतन बिल तैयार करने के निर्देश दिए गए। ट्रेजरी की सक्रियता – कोषागार कार्यालयों को अतिरिक्त समय तक कार्य कर बिल पास करने को कहा गया। बैंकिंग समन्वय – बैंकों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित किया गया कि भुगतान समय से कर्मचारियों के खातों में पहुंचे। डिजिटल प्रक्रिया का उपयोग – ई-भुगतान प्रणाली के माध्यम से प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाया गया कर्मचारियों में खुशी की लहर इस निर्णय के बाद सरकारी कर्मचारियों में व्यापक खुशी देखी गई। त्योहारों के समय परिवारों की जरूरतें बढ़ जाती हैं—नए कपड़े, मिठाइयां, रंग-गुलाल, बच्चों के लिए उपहार, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने का खर्च आदि। ऐसे समय यदि वेतन में देरी हो जाए तो असुविधा होती है। सरकार द्वारा समय से पहले वेतन जारी करने से कर्मचारियों को आर्थिक रूप से राहत मिली है। विशेष रूप से शिक्षकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उनके पास वेतन आने से स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ती है। आर्थिक प्रभाव राज्य के लाखों कर्मचारियों को एक साथ वेतन जारी होने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा। होली के अवसर पर खरीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी लाभ होगा। वस्त्र, मिठाई, रंग-गुलाल, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि हो सकती है। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाला भी माना जा सकता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधि में तेजी आती है। राजनीतिक और सामाजिक संदेश Yogi Adityanath की सरकार का यह निर्णय कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। त्योहारों के समय इस प्रकार के निर्णय कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और सरकार के प्रति सकारात्मक भावना उत्पन्न करते हैं। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे संतुष्ट और प्रेरित हों तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से होता है। समय पर वेतन भुगतान कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी है। पहले भी मिल चुकी हैं ऐसी सौगातें पिछले वर्षों में भी त्योहारों से पहले बोनस या अग्रिम वेतन जैसी घोषणाएं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की जाती रही हैं। हालांकि हर बार परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इस बार अवकाश और त्योहार की तिथियों के कारण यह निर्णय आवश्यक हो गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि समय से पहले वेतन देने का निर्णय प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है, क्योंकि इसमें बजटीय प्रबंधन और नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखना होता है। संभावित चुनौतियां हालांकि आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि किसी विभाग में तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजी कमी या बैंकिंग समस्या उत्पन्न होती है तो कुछ कर्मचारियों को असुविधा हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। कर्मचारियों की अपेक्षाएं इस निर्णय के बाद कर्मचारियों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि भविष्य में भी त्योहारों के समय इसी प्रकार की संवेदनशीलता दिखाई जाएगी। साथ ही वे नियमित वेतन भुगतान, महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से संबंधित मुद्दों पर भी सरकार से सकारात्मक रुख की आशा रखते हैं। UP NEWSYogi AdityanathHoli 2026
भोपाल में सोमवार को लाल परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) कमांडो ने पावर शॉ दिखाया। कमांडो ने हेलीकॉप्टर से उतरकर इमारत में घुसने, आतंकियों से मुकाबला करने, बम खोजने और निष्क्रिय करने, डॉग स्क्वॉड के जरिए आईईडी पहचानने और लोगों को सुरक्षित निकालने जैसी कार्रवाई का लाइव प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में मोहन यादव, पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा, NSG के महानिदेशक सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। देखिए तस्वीरें… NSG ने आतंकियों ने सरेंडर करवाया। NSG के साथ डाॅग स्क्वार्ड का प्रदर्शन। विपरीत परिस्थितियों में आम लोगों को आतंकियों से बचाते कमांडो। सीएम बोले- 200 करोड़ रुपए की डीपीआर तैयार इस मौके पर सीएम मोहन यादव ने कहा- सीपीजी काउंटर टेररिज्म ग्रुप बनाने के लिए मप्र सरकार ने 200 करोड़ रुपए की डीपीआर तैयार कर ली है। भविष्य में सभी प्रकार के खतरों से निपटने के लिए भोपाल के ग्राम तूमड़ा में सेंटर बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की दुनिया के सामने पहचान बन रही है। जब देश के प्रधानमंत्री भी सुरक्षित नहीं थे और राजीव गांधी की हत्या हुई थी, तब सशस्त्र बलों ने अपने पराक्रम से सुरक्षा मुहैया कराई। जब भी देश में किसी संकट से सामना होता है, तब एनएसजी कमांडो रक्षा करते हैं। मुझे एनएसजी पर गर्व है। 'कोई हमें छेड़ेगा तो करारा जवाब मिलेगा' सीएम कहा कि हमारी सेना देश के दुश्मनों के घर में घुसकर मारने का काम करती है। हम किसी को छेड़ते नहीं हैं, लेकिन यदि कोई हमें छेड़ेगा तो उसे करारा जवाब दिया जाएगा। यह संयुक्त प्रशिक्षण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संकल्प से सिद्धि का अभियान है। हम सर्वजन सुखाय की बात करते हैं। जो जिस प्रकार का है, उसे उसी प्रकार की भाषा में जवाब देने की तैयारी होनी चाहिए। डॉ. यादव ने कहा कि हमारे बलों को सभी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता है। भारत और प्रदेश को आगे बढ़ने में कई लोग बाधा डालते हैं। हमने नक्सलवाद पर काबू पा लिया है। मप्र पुलिस और भारत सरकार ने मिलकर ऐसी गतिविधियों को रोकने में सफलता पाई है। 'हवा में उड़ते बजरंगबली जा रहे हों' सीएम ने कहा कि हमारे कमांडो ने क्या-क्या नहीं दिखाया। जैसे हवा में बजरंगबली जा रहे हों। हमारे जवानों ने भी शानदार करतब दिखाए। काल भैरव के गणों ने भी गजब प्रदर्शन किया। आपका प्रदर्शन अद्भुत रहा। आकस्मिक आपदा के लिए हम अपनी सशक्त भूमिका निभाना चाहते हैं। हमारे जवान सभी प्रकार के संकटों से निपटने में सक्षम हैं। खाली हाथ होते हुए भी वे दो-दो, चार-चार लोगों को उठाकर पटक रहे थे। यह देखकर आनंद आया। डॉग स्क्वॉड ने आईईडी की पहचान कमांडो ने Mi-17 helicopter से स्लिथरिंग कर इमारत में प्रवेश किया और हाउस इंटरवेंशन की कार्रवाई दिखाई। K-9 डॉग स्क्वॉड ने आईईडी की पहचान की, वहीं बम निष्क्रियकरण और एंटी-ड्रोन तकनीक का भी प्रदर्शन किया गया। कमांडो ने बहुमंजिला भवन पर हमले को निष्क्रिय करने, आतंकियों से हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट और आम लोगों को सुरक्षित निकालने की ड्रिल भी प्रदर्शित की। इसके साथ ही वीआईपी सुरक्षा, क्राव मागा तकनीक और अंडरवॉटर डाइविंग से जुड़ी कार्रवाई भी दिखाई गई।
Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज का ताजा भाव क्या है? Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से बाजार में लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज शनिवार 28 फरवरी के कारोबारी दिन सोने-चांदी का ताजा भाव क्या है? सोने के आउटलुक पर जेपी मॉर्गन का अपडेट वैश्विक बाजार में सोने को लेकर नई उम्मीदें जताई जा रही हैं. जेपी मॉर्गन ने अपना लॉन्ग-टर्म प्राइस टारगेट बढ़ाकर 4,500 डॉलर प्रति औंस कर दिया है. जबकि 2026 के अंत के लिए 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान पहले की तरह कायम रखा है. जेपी मॉर्गन के अनुसार निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्ट्रक्चरल डायवर्सिफिकेशन का रुझान अभी जारी है. जिससे आगे भी सोने में तेजी की संभावना बनी रह सकती है. चांदी के ताजा भाव दिल्ली, मंबई, कोलकाता और चेन्नई में चांदी की कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है. दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में 10 ग्राम चांदी आज 2,950 रुपये की दर पर बिक रहा है. वहीं, 100 ग्राम चांदी खरीदने के लिए ग्राहकों को 29,500 रुपये खर्च करने होंगे. चेन्नई में 10 ग्राम चांदी की कीमत 3,000 रुपये चल रही है. आपके शहर में सोने का भाव (गुड रिटर्न के अनुसार) दिल्ली में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए मुंबई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए चेन्नई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,65,820 रुपए 22 कैरेट - 1,52,000 रुपए 18 कैरेट - 1,30,100 रुपए कोलकाता में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए अहमदाबाद में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए लखनऊ में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए पटना में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए हैदराबाद में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए
रश्मिका-विजय के रिसेप्शन में बिना चप्पल-जूते पहने पहुंचे रामचरण, वजह जान हो जाएंगे हैरान Ramcharan: हैदराबाद में हुए ग्रैंड रिसेप्शन में रश्मिका और विजय ने खूब चर्चा बटोरी. हालांकि सबसे ज्यादा ध्यान राम चरण के अलग अंदाज ने खींचा, जहां वो काले कपड़ों और नंगे पैर में नजर आए. साउथ फिल्म इंडस्ट्री के पॉपुलर कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. 4 मार्च को हैदराबाद में दोनों ने एक भव्य रिसेप्शन का आयोजन किया गया, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े सितारे शामिल हुए. इस खास मौके पर जहां हर कोई कपल को बधाई देने पहुंचा, वहीं एक्टर राम चरण अपने अनोखे अंदाज की वजह से सबसे ज्यादा चर्चा में आ गए. नंगे पैर रिसेप्शन में आए रामचरण रिसेप्शन में राम चरण अपनी पत्नी उपासना के साथ पहुंचे थे. उन्होंने सिर से पैर तक काले रंग के कपड़े पहने हुए थे. लेकिन लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा इस बात ने खींचा कि वो बिना जूते-चप्पल के, यानी नंगे पैर ही कार्यक्रम में आए थे. उन्हें इस तरह देखकर कई लोग हैरान रह गए और सोशल मीडिया पर भी उनकी तस्वीरें तेजी से वायरल होने लगीं. लेकिन इसके पीछे एक खास धार्मिक वजह है. राम चरण इन दिनों 'अयप्पा दीक्षा' का पालन कर रहे हैं. ये भगवान अयप्पा के भक्तों द्वारा किया जाने वाला एक कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है. इस व्रत के दौरान भक्तों को कुछ नियमों का सख्ती से पालन करना पड़ता है. 41 दिन की दीक्षा ले रहे रामचरण व्रत में काले या नीले रंग के कपड़े पहनना, सादगी से रहना और 41 दिनों तक नंगे पैर रहना शामिल होता है. इसी कारण राम चरण रिसेप्शन में भी बिना जूते के नजर आए. अयप्पा दीक्षा को अनुशासित और कठिन माना जाता है. इस बीच भक्तों को पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है. साथ ही मांसाहारी भोजन, शराब से दूर रहना और बाल या दाढ़ी भी नहीं कटवाना होता है. ये व्रत सबरीमाला मंदिर की यात्रा से पहले किया जाता है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब राम चरण इस तरह नंगे पैर नजर आए हों. इससे पहले 2023 में ऑस्कर समारोह में शामिल होने से पहले भी वह अयप्पा दीक्षा का पालन करते हुए दिखाई दिए थे.