राज्य/शहर

हिंदी न्यूज़ राज्य दिल्ली

Dehli Politics: 'तरीका एक, चेहरे अलग...' उमर खालिद और राहुल गांधी की फोटो लगाकर बीजेपी का बड़ा हमला

Metroheadlines फ़रवरी 26, 2026 0

AI Summit 2026 में IYC के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए प्रदर्शन के बाद Delhi में BJP के ऑफिस के बाहर पोस्टर लगाया गया है. इसमें राहुल गांधी और उमर खालिद की फोटो लगाई गई है.

 

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर के बाहर एक पोस्टर में जिन दो घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे अलग-अलग समय की हैं, लेकिन बीजेपी का दावा है कि दोनों की टाइमिंग और मंशा में समानता है। पहला संदर्भ वर्ष 2020 का है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump भारत दौरे पर आए थे। उसी दौरान दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन और बाद में हिंसा की घटनाएं हुई थीं। इन मामलों में उमर खालिद पर साजिश रचने के आरोप लगे थे, जिन्हें वे नकारते रहे हैं। दूसरा संदर्भ हालिया एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) शिखर सम्मेलन का बताया जा रहा है, जिसमें 20 देशों के प्रतिनिधि भारत आए थे। बीजेपी का आरोप है कि इस दौरान विपक्ष की ओर से विरोध प्रदर्शन किए गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई।

 

आरपी सिंह ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि वर्ष 2020 में उमर खालिद ने उस समय विरोध का रास्ता चुना जब डोनाल्ड ट्रंप भारत में थे, ताकि वैश्विक ध्यान आकर्षित किया जा सके। उनके अनुसार, ठीक उसी तरह राहुल गांधी ने भी ऐसे समय में विरोध दर्ज कराया जब अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भारत में मौजूद था। सिंह का कहना है कि दोनों घटनाओं में “टाइमिंग” एक समान रणनीति की ओर इशारा करती है—ऐसी रणनीति, जिसका उद्देश्य देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करना है।

 

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि एआई समिट के दौरान कुछ लोगों को कथित रूप से उग्र प्रदर्शन के लिए भेजा गया। उन्होंने यह भी कहा कि कपड़े उतारकर प्रदर्शन करने जैसी घटनाएं भारत की गरिमा के खिलाफ हैं और इससे देश की प्रतिष्ठा पर आंच आती है। हालांकि इन आरोपों पर कांग्रेस या संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिनमें इन दावों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताया गया है।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पोस्टर के जरिए बीजेपी विपक्ष पर तीखा हमला करना चाहती है। राहुल गांधी, जो वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, पहले भी केंद्र सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में पोस्टर के माध्यम से उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के साथ जोड़कर दिखाना, जिन पर गंभीर आरोप लगे हैं, निश्चित रूप से एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

 

यह विवाद केवल पोस्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। भारतीय राजनीति में पोस्टर, होर्डिंग और सार्वजनिक संदेश लंबे समय से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन जब इनमें प्रयुक्त भाषा “देशद्रोही” जैसे शब्दों तक पहुंच जाती है, तो यह बहस और भी तीखी हो जाती है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है और असहमति को देशविरोध से जोड़ना स्वस्थ परंपरा नहीं है।

 

कांग्रेस की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से विस्तृत बयान सामने न भी आया हो, लेकिन पार्टी नेताओं ने अनौपचारिक तौर पर इसे “ध्यान भटकाने की कोशिश” बताया है। उनका तर्क है कि विपक्ष का विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है और उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश को बदनाम करने की साजिश बताना अनुचित है। वहीं बीजेपी का कहना है कि विरोध का अधिकार है, लेकिन उसकी टाइमिंग और तरीका राष्ट्रहित के खिलाफ नहीं होना चाहिए।

 

इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू यह है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अन्य मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि “सड़क को मौत का गड्ढा नहीं बनने दिया जा सकता।” यह टिप्पणी भले ही ठेकेदारों को अग्रिम जमानत से इनकार के संदर्भ में थी, लेकिन राजनीतिक बहस के बीच इसे भी कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक जिम्मेदारी के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। राजनीतिक दल अक्सर ऐसे न्यायिक बयानों को अपने-अपने तर्कों के समर्थन में उद्धृत करते हैं।

 

उमर खालिद का नाम 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में सामने आया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए थे। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। दूसरी ओर राहुल गांधी लंबे समय से केंद्र सरकार की आर्थिक, सामाजिक और विदेश नीति पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में दोनों को एक ही फ्रेम में रखकर तुलना करना राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील कदम माना जा रहा है।

 

पोस्टर की हेडलाइन—“एक अराजक तरीका, देशद्रोहियों के अलग-अलग चेहरे”—ने विवाद को और बढ़ा दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि किसी निर्वाचित सांसद और नेता प्रतिपक्ष को “देशद्रोही” कहना लोकतांत्रिक संस्थाओं का अपमान है। वहीं बीजेपी का पक्ष है कि यह राजनीतिक टिप्पणी है और पार्टी अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है।

 

राजनीतिक रणनीति के नजरिए से देखें तो ऐसे पोस्टर अक्सर समर्थकों को एकजुट करने और विरोधियों पर वैचारिक हमला करने के लिए लगाए जाते हैं। खासकर जब अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम या बड़े कूटनीतिक आयोजन हो रहे हों, तब सरकारें और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीतिक रेखाएं स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। इस मामले में भी एआई समिट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी को केंद्र में रखकर बहस को राष्ट्र की छवि बनाम विरोध की राजनीति के रूप में पेश किया गया है।

 

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या कानूनी और संसदीय स्तर तक पहुंचता है। यदि कांग्रेस औपचारिक आपत्ति दर्ज कराती है या चुनाव आयोग अथवा अन्य मंचों पर शिकायत करती है, तो मामला और गहरा सकता है। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में लगाया गया यह पोस्टर राष्ट्रीय स्तर की बहस का विषय बन चुका है।

 

समग्र रूप से देखें तो यह प्रकरण भारतीय राजनीति में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति को दर्शाता है। जहां एक ओर सत्तारूढ़ दल विपक्ष की गतिविधियों को राष्ट्रहित के संदर्भ में परखने की बात करता है, वहीं विपक्ष इसे असहमति की आवाज दबाने का प्रयास बताता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और प्रतिरोध की अपनी जगह है, लेकिन उसकी भाषा, समय और स्वरूप को लेकर हमेशा बहस होती रही है।

 

दिल्ली के इस पोस्टर विवाद ने एक बार फिर यही प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या राजनीतिक असहमति को देशविरोध से जोड़ना उचित है, या यह लोकतांत्रिक विमर्श को और अधिक कठोर बना देता है? आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है, क्योंकि दोनों ही पक्ष इसे अपने-अपने समर्थकों के बीच बड़े नैरेटिव के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

Popular post
MP के विकास को मिली गति! गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी

MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे.  Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है.   रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे   इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्‍यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे.   गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा   करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.  

नॉट आउट @100' का आगाज़, CM मोहन ने शुरू किया 100 घंटे का ऐतिहासिक क्रिकेट महोत्सव

Madhya Pradesh News: भोपाल में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राष्ट्रीय दिव्यांगजन क्रिकेट खेल महोत्सव 2026 का शुभारंभ किया, जिसमें 25 से अधिक राज्यों के खिलाड़ी 100 घंटे की प्रतियोगिता में भाग लेंगे.    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आज पुलिस लाइन स्टेडियम, भोपाल में राष्ट्रीय दिव्यांगजन क्रिकेट खेल महोत्सव-2026 "नॉट आउट @ 100" का शुभारंभ किया. इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने आयोजन के लिए सभी प्रतिभागियों और आयोजकों को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं. उन्होंने कहा कि लगातार 100 घंटे तक चलने वाली इस अनूठी प्रतियोगिता में 25 से अधिक राज्यों की टीमें भाग ले रही हैं. दिव्यांग खिलाड़ी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के साथ खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं.    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्यप्रदेश दिव्यांगजन के खेलों के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है. प्रदेश के कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना कर प्रदेश को गौरवान्वित किया है. समाज सुधारक और चिंतक स्व. कुशाभाऊ ठाकरे की जन्म शताब्दी वर्ष पर 100 घंटे लगातार क्रिकेट खेलने का यह प्रयास केवल रिकॉर्ड बनाने की कोशिश नहीं, बल्कि यह संदेश है कि जब संकल्प समाज के उत्थान के लिए होता है तो सीमाएं स्वयं समाप्त हो जाती हैं.   सीएम मोहन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकलांग शब्द के स्थान पर दिव्यांग शब्द को स्थापित किया है. उनका यह कदम भारतीय संस्कृति के मनोभाव के अनुरूप है. इस पहल ने विकलांग शब्द से जन सामान्य में उपजती हीनता की भावना का अंत किया है, साथ ही चुनौतिपूर्ण परि‍स्थितियों में संघर्ष की अदम्य इच्छा शक्ति को प्रोत्साहित किया है. प्रधानमंत्री मोदी की सकारात्मक सोच के अनुरूप देश को सभी क्षेत्रों में आगे लाने के प्रयास को साकार रूप देने के उद्देश्य से ही राष्ट्रीय दिव्यांगजन क्रिकेट खेल महोत्सव 2026 नॉट आउट@100 का आयोजन किया गया है.    100 घंटे क्रिकेट: अद्भुत और गर्व का अवसर   मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने क्रिकेट पिच पर पहुंचकर खिलाड़ियों से परिचय प्राप्त किया तथा एक बॉल खेलकर मैच का शुभारंभ किया. पहला मैच मध्यप्रदेश और राजस्थान की ऑर्थो केटेगरी टीम के बीच रहा. इसके पहले मुख्यमंत्री डॉ. यादव को खेल महोत्सव का बैच लगाया गया. मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने टूर्नामेंट की कैप भी धारण की. मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राष्ट्रीय दिव्यांग खेल महोत्सव के अंतर्गत दिव्यांगजन का लगातार 100 घंटे क्रिकेट खेलना अद्भुत, आनंददायी और हम सबके लिए गर्व का अवसर है.   उन्होंने इस आयोजन के लिए कुशाभाऊ ठाकरे न्यास और इंटर नेशनल पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर को बधाई दी. उन्होंने कहा कि हमारे लिए यह सौभाग्य का विषय है कि प्रधानमंत्री मोदी की "मन की बात" के श्रवण के साथ यह खेल महोत्सव आयोजित हो रहा है. यह सभी क्षेत्रों में सर्वागींण रूप से समान भाव के साथ आगे बढ़ने की प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिबद्धता का परिचायक है.   दिव्यांग बेटियों की इच्छाशक्ति को सराहा   मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दिव्यांग बेटी संगीता विश्नोई की इच्छाशक्ति की सराहना करते हुए कहा कि बेटियां केवल खिलाड़ी नहीं, आत्मविश्वास और साहस की जीवंत मिसाल हैं.  

'भूत बंगला' का पहला गाना ‘राम जी आके भला करेंगे’ हुआ रिलीज, 14 साल बाद अक्षय-प्रियदर्शन की जोड़ी ने फिर मचाया धमाल

'भूत बंगला' का पहला गाना ‘राम जी आके भला करेंगे’ हुआ रिलीज, 14 साल बाद अक्षय-प्रियदर्शन की जोड़ी ने फिर मचाया धमाल   Bhoot Bangla Song: ‘भूत बंगला’ को लेकर काफी एक्साइटमेंट है क्योंकि अक्षय कुमार और प्रियदर्शन 14 साल बाद फिर साथ काम कर रहे हैं. अब फिल्म का पहला गाना ‘राम जी आके भला करेंगे’ भी रिलीज हो चुका है.   ‘भूत बंगला’ को लेकर लोगों की एक्साइटमेंट लगातार बढ़ रही है क्योंकि ये फिल्म अक्षय कुमार और फिल्ममेकर प्रियदर्शन की OG बॉलीवुड जोड़ी को पूरे 14 साल बाद फिर से साथ ला रही है. बालाजी मोशन पिक्चर्स द्वारा प्रोड्यूस की गई इस फिल्म ने उन लोगों के बीच पहले ही जबरदस्त उत्साह पैदा कर दिया है जो इस जोड़ी की आइकॉनिक कॉमेडी फिल्मों को देखकर बड़े हुए हैं.   पहला गाना हुआ रिलीज एक्साइटमेंट को और बढ़ाते हुए मेकर्स ने फिल्म का पहला गाना ‘राम जी आके भला करेंगे’ रिलीज कर दिया है. ये एक हाई एनर्जी ट्रैक है जिसमें अक्षय कुमार अपने पूरे एंटरटेनर अंदाज में नजर आ रहे हैं. गाने में पागलपन, नॉस्टैल्जिया और उनकी वही पुरानी कॉमिक एनर्जी साफ दिखती है. ये ट्रैक फिल्म की मजेदार दुनिया की एक झलक देता है.   हंसी और भूतिया मस्ती का तड़का कॉमिक एनर्जी से भरपूर ये पेपी गाना फिल्म की असली वाइब को पकड़ता है. इसके हाई बीट्स और मस्ती भरे विजुअल्स साफ बता देते हैं कि ‘भूत बंगला’ एक फुल एंटरटेनर होने वाली है. गाने में अक्षय कुमार अपने क्लासिक स्टाइल में भूतिया माहौल और अजीबोगरीब भूतों के बीच आराम से घूमते नजर आते हैं. उनका फ्रंटिक और मजेदार परफॉर्मेंस पूरे गाने को और भी दिलचस्प बना देता है.   म्यूजिक टीम ने लगाया तगड़ा तड़का इस गाने का म्यूजिक प्रीतम ने दिया है और लिरिक्स कुमार ने लिखे हैं. इसे अरमान मलिक और आरवन (देव अरिजीत) ने अपनी आवाज दी है. साथ ही मेलो डी का रैप सेगमेंट गाने को मॉडर्न टच देता है जिससे इसकी बीट्स और भी ज्यादा कैची हो जाती हैं.   शानदार स्टारकास्ट के साथ रिलीज डेट भी तय बालाजी मोशन पिक्चर्स जो बालाजी टेलीफिल्म्स लिमिटेड का हिस्सा है केप ऑफ गुड फिल्म्स के साथ मिलकर ‘भूत बंगला’ लेकर आ रहे हैं. फिल्म में अक्षय कुमार के साथ वामीका गब्बी, परेश रावल, तब्बू और राजपाल यादव लीड रोल में नजर आएंगे. प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी इस फिल्म को अक्षय कुमार, शोभा कपूर और एकता आर कपूर ने प्रोड्यूस किया है. ये फिल्म 10 अप्रैल 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी.  

UP News: होली से पहले सरकारी कर्मचारियों की होगी बल्ले-बल्ले, योगी सरकार ने लिया बड़ा फैसला

UP News In Hindi: सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के शिक्षकों समेत लाखों को कर्मचारियों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान कर दिया है. इसके लिए सरकार की तरफ से आदेश जारी किया गया है   होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह पर्व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को पड़ रही है। सामान्यतः सरकारी कर्मचारियों का वेतन महीने के अंतिम या अगले महीने के प्रारंभिक दिनों में जारी होता है, लेकिन इस बार त्योहार और अवकाश के कारण वेतन भुगतान की तिथि प्रभावित हो रही थी। रविवार (1 मार्च) को साप्ताहिक अवकाश तथा 2 मार्च को होलिका दहन होने के कारण नियमित प्रक्रिया से वेतन जारी करना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए शनिवार (28 फरवरी) को ही वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर त्वरित समन्वय और संवेदनशीलता को दर्शाता है।   शिक्षा विभाग की भूमिका   स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय की ओर से 2 मार्च से पहले वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। यह आदेश उत्तर प्रदेश स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारी और वित्तीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि होलिका दहन से पहले शिक्षकों और कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंच जाए।   शिक्षा विभाग राज्य का एक बड़ा विभाग है, जिसमें बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, राजकीय इंटर कॉलेज, सहायता प्राप्त विद्यालय और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से पहले वेतन देने के लिए विभाग को वित्तीय और तकनीकी स्तर पर व्यापक तैयारी करनी पड़ी। ट्रेजरी, बैंकिंग प्रणाली और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर भुगतान प्रक्रिया को तेज किया गया।     वित्त विभाग ने भी इस संबंध में शासनादेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया कि अवकाश के कारण नियमित तिथि पर वेतन भुगतान संभव नहीं था, इसलिए विशेष अनुमति के तहत अग्रिम भुगतान का निर्णय लिया गया है। इस फैसले को राज्यपाल Anandiben Patel की मंजूरी प्राप्त होने के बाद लागू किया गया।   राज्यपाल की स्वीकृति का उल्लेख इस बात का संकेत है कि यह निर्णय केवल विभागीय स्तर का नहीं बल्कि उच्च प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है। इससे आदेश की वैधता और गंभीरता स्पष्ट होती है।   प्रशासनिक समन्वय और कार्यान्वयन   राज्य सरकार की ओर से सभी जिलाधिकारियों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने-अपने विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन 28 फरवरी तक हर हाल में जारी करें। साथ ही आदेश के पालन को लेकर सख्त हिदायत दी गई। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी को गंभीरता से लिया जाएगा।   वेतन भुगतान की प्रक्रिया में निम्नलिखित स्तरों पर कार्य हुआ: वेतन बिलों की समयपूर्व तैयारी – संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) को समय से पहले वेतन बिल तैयार करने के निर्देश दिए गए। ट्रेजरी की सक्रियता – कोषागार कार्यालयों को अतिरिक्त समय तक कार्य कर बिल पास करने को कहा गया। बैंकिंग समन्वय – बैंकों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित किया गया कि भुगतान समय से कर्मचारियों के खातों में पहुंचे। डिजिटल प्रक्रिया का उपयोग – ई-भुगतान प्रणाली के माध्यम से प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाया गया कर्मचारियों में खुशी की लहर   इस निर्णय के बाद सरकारी कर्मचारियों में व्यापक खुशी देखी गई। त्योहारों के समय परिवारों की जरूरतें बढ़ जाती हैं—नए कपड़े, मिठाइयां, रंग-गुलाल, बच्चों के लिए उपहार, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने का खर्च आदि। ऐसे समय यदि वेतन में देरी हो जाए तो असुविधा होती है। सरकार द्वारा समय से पहले वेतन जारी करने से कर्मचारियों को आर्थिक रूप से राहत मिली है।   विशेष रूप से शिक्षकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उनके पास वेतन आने से स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ती है।   आर्थिक प्रभाव राज्य के लाखों कर्मचारियों को एक साथ वेतन जारी होने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा। होली के अवसर पर खरीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी लाभ होगा। वस्त्र, मिठाई, रंग-गुलाल, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि हो सकती है। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाला भी माना जा सकता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधि में तेजी आती है।   राजनीतिक और सामाजिक संदेश   Yogi Adityanath की सरकार का यह निर्णय कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। त्योहारों के समय इस प्रकार के निर्णय कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और सरकार के प्रति सकारात्मक भावना उत्पन्न करते हैं। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे संतुष्ट और प्रेरित हों तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से होता है। समय पर वेतन भुगतान कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी है।   पहले भी मिल चुकी हैं ऐसी सौगातें   पिछले वर्षों में भी त्योहारों से पहले बोनस या अग्रिम वेतन जैसी घोषणाएं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की जाती रही हैं। हालांकि हर बार परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इस बार अवकाश और त्योहार की तिथियों के कारण यह निर्णय आवश्यक हो गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि समय से पहले वेतन देने का निर्णय प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है, क्योंकि इसमें बजटीय प्रबंधन और नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखना होता है।   संभावित चुनौतियां   हालांकि आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि किसी विभाग में तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजी कमी या बैंकिंग समस्या उत्पन्न होती है तो कुछ कर्मचारियों को असुविधा हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।   कर्मचारियों की अपेक्षाएं   इस निर्णय के बाद कर्मचारियों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि भविष्य में भी त्योहारों के समय इसी प्रकार की संवेदनशीलता दिखाई जाएगी। साथ ही वे नियमित वेतन भुगतान, महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से संबंधित मुद्दों पर भी सरकार से सकारात्मक रुख की आशा रखते हैं।   UP NEWSYogi AdityanathHoli 2026  

Dehli Politics: 'तरीका एक, चेहरे अलग...' उमर खालिद और राहुल गांधी की फोटो लगाकर बीजेपी का बड़ा हमला

AI Summit 2026 में IYC के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए प्रदर्शन के बाद Delhi में BJP के ऑफिस के बाहर पोस्टर लगाया गया है. इसमें राहुल गांधी और उमर खालिद की फोटो लगाई गई है.   दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर के बाहर एक पोस्टर में जिन दो घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे अलग-अलग समय की हैं, लेकिन बीजेपी का दावा है कि दोनों की टाइमिंग और मंशा में समानता है। पहला संदर्भ वर्ष 2020 का है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump भारत दौरे पर आए थे। उसी दौरान दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन और बाद में हिंसा की घटनाएं हुई थीं। इन मामलों में उमर खालिद पर साजिश रचने के आरोप लगे थे, जिन्हें वे नकारते रहे हैं। दूसरा संदर्भ हालिया एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) शिखर सम्मेलन का बताया जा रहा है, जिसमें 20 देशों के प्रतिनिधि भारत आए थे। बीजेपी का आरोप है कि इस दौरान विपक्ष की ओर से विरोध प्रदर्शन किए गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई।   आरपी सिंह ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि वर्ष 2020 में उमर खालिद ने उस समय विरोध का रास्ता चुना जब डोनाल्ड ट्रंप भारत में थे, ताकि वैश्विक ध्यान आकर्षित किया जा सके। उनके अनुसार, ठीक उसी तरह राहुल गांधी ने भी ऐसे समय में विरोध दर्ज कराया जब अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भारत में मौजूद था। सिंह का कहना है कि दोनों घटनाओं में “टाइमिंग” एक समान रणनीति की ओर इशारा करती है—ऐसी रणनीति, जिसका उद्देश्य देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करना है।   बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि एआई समिट के दौरान कुछ लोगों को कथित रूप से उग्र प्रदर्शन के लिए भेजा गया। उन्होंने यह भी कहा कि कपड़े उतारकर प्रदर्शन करने जैसी घटनाएं भारत की गरिमा के खिलाफ हैं और इससे देश की प्रतिष्ठा पर आंच आती है। हालांकि इन आरोपों पर कांग्रेस या संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिनमें इन दावों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताया गया है।   राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पोस्टर के जरिए बीजेपी विपक्ष पर तीखा हमला करना चाहती है। राहुल गांधी, जो वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, पहले भी केंद्र सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में पोस्टर के माध्यम से उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के साथ जोड़कर दिखाना, जिन पर गंभीर आरोप लगे हैं, निश्चित रूप से एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।   यह विवाद केवल पोस्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। भारतीय राजनीति में पोस्टर, होर्डिंग और सार्वजनिक संदेश लंबे समय से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन जब इनमें प्रयुक्त भाषा “देशद्रोही” जैसे शब्दों तक पहुंच जाती है, तो यह बहस और भी तीखी हो जाती है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है और असहमति को देशविरोध से जोड़ना स्वस्थ परंपरा नहीं है।   कांग्रेस की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से विस्तृत बयान सामने न भी आया हो, लेकिन पार्टी नेताओं ने अनौपचारिक तौर पर इसे “ध्यान भटकाने की कोशिश” बताया है। उनका तर्क है कि विपक्ष का विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है और उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश को बदनाम करने की साजिश बताना अनुचित है। वहीं बीजेपी का कहना है कि विरोध का अधिकार है, लेकिन उसकी टाइमिंग और तरीका राष्ट्रहित के खिलाफ नहीं होना चाहिए।   इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू यह है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अन्य मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि “सड़क को मौत का गड्ढा नहीं बनने दिया जा सकता।” यह टिप्पणी भले ही ठेकेदारों को अग्रिम जमानत से इनकार के संदर्भ में थी, लेकिन राजनीतिक बहस के बीच इसे भी कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक जिम्मेदारी के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। राजनीतिक दल अक्सर ऐसे न्यायिक बयानों को अपने-अपने तर्कों के समर्थन में उद्धृत करते हैं।   उमर खालिद का नाम 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में सामने आया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए थे। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। दूसरी ओर राहुल गांधी लंबे समय से केंद्र सरकार की आर्थिक, सामाजिक और विदेश नीति पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में दोनों को एक ही फ्रेम में रखकर तुलना करना राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील कदम माना जा रहा है।   पोस्टर की हेडलाइन—“एक अराजक तरीका, देशद्रोहियों के अलग-अलग चेहरे”—ने विवाद को और बढ़ा दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि किसी निर्वाचित सांसद और नेता प्रतिपक्ष को “देशद्रोही” कहना लोकतांत्रिक संस्थाओं का अपमान है। वहीं बीजेपी का पक्ष है कि यह राजनीतिक टिप्पणी है और पार्टी अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है।   राजनीतिक रणनीति के नजरिए से देखें तो ऐसे पोस्टर अक्सर समर्थकों को एकजुट करने और विरोधियों पर वैचारिक हमला करने के लिए लगाए जाते हैं। खासकर जब अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम या बड़े कूटनीतिक आयोजन हो रहे हों, तब सरकारें और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीतिक रेखाएं स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। इस मामले में भी एआई समिट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी को केंद्र में रखकर बहस को राष्ट्र की छवि बनाम विरोध की राजनीति के रूप में पेश किया गया है।   आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या कानूनी और संसदीय स्तर तक पहुंचता है। यदि कांग्रेस औपचारिक आपत्ति दर्ज कराती है या चुनाव आयोग अथवा अन्य मंचों पर शिकायत करती है, तो मामला और गहरा सकता है। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में लगाया गया यह पोस्टर राष्ट्रीय स्तर की बहस का विषय बन चुका है।   समग्र रूप से देखें तो यह प्रकरण भारतीय राजनीति में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति को दर्शाता है। जहां एक ओर सत्तारूढ़ दल विपक्ष की गतिविधियों को राष्ट्रहित के संदर्भ में परखने की बात करता है, वहीं विपक्ष इसे असहमति की आवाज दबाने का प्रयास बताता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और प्रतिरोध की अपनी जगह है, लेकिन उसकी भाषा, समय और स्वरूप को लेकर हमेशा बहस होती रही है।   दिल्ली के इस पोस्टर विवाद ने एक बार फिर यही प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या राजनीतिक असहमति को देशविरोध से जोड़ना उचित है, या यह लोकतांत्रिक विमर्श को और अधिक कठोर बना देता है? आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है, क्योंकि दोनों ही पक्ष इसे अपने-अपने समर्थकों के बीच बड़े नैरेटिव के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

राज्य/शहर

View more
Dehli Politics: 'तरीका एक, चेहरे अलग...' उमर खालिद और राहुल गांधी की फोटो लगाकर बीजेपी का बड़ा हमला

AI Summit 2026 में IYC के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए प्रदर्शन के बाद Delhi में BJP के ऑफिस के बाहर पोस्टर लगाया गया है. इसमें राहुल गांधी और उमर खालिद की फोटो लगाई गई है.   दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर के बाहर एक पोस्टर में जिन दो घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे अलग-अलग समय की हैं, लेकिन बीजेपी का दावा है कि दोनों की टाइमिंग और मंशा में समानता है। पहला संदर्भ वर्ष 2020 का है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump भारत दौरे पर आए थे। उसी दौरान दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन और बाद में हिंसा की घटनाएं हुई थीं। इन मामलों में उमर खालिद पर साजिश रचने के आरोप लगे थे, जिन्हें वे नकारते रहे हैं। दूसरा संदर्भ हालिया एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) शिखर सम्मेलन का बताया जा रहा है, जिसमें 20 देशों के प्रतिनिधि भारत आए थे। बीजेपी का आरोप है कि इस दौरान विपक्ष की ओर से विरोध प्रदर्शन किए गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई।   आरपी सिंह ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि वर्ष 2020 में उमर खालिद ने उस समय विरोध का रास्ता चुना जब डोनाल्ड ट्रंप भारत में थे, ताकि वैश्विक ध्यान आकर्षित किया जा सके। उनके अनुसार, ठीक उसी तरह राहुल गांधी ने भी ऐसे समय में विरोध दर्ज कराया जब अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भारत में मौजूद था। सिंह का कहना है कि दोनों घटनाओं में “टाइमिंग” एक समान रणनीति की ओर इशारा करती है—ऐसी रणनीति, जिसका उद्देश्य देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करना है।   बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि एआई समिट के दौरान कुछ लोगों को कथित रूप से उग्र प्रदर्शन के लिए भेजा गया। उन्होंने यह भी कहा कि कपड़े उतारकर प्रदर्शन करने जैसी घटनाएं भारत की गरिमा के खिलाफ हैं और इससे देश की प्रतिष्ठा पर आंच आती है। हालांकि इन आरोपों पर कांग्रेस या संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, जिनमें इन दावों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताया गया है।   राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पोस्टर के जरिए बीजेपी विपक्ष पर तीखा हमला करना चाहती है। राहुल गांधी, जो वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, पहले भी केंद्र सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में पोस्टर के माध्यम से उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के साथ जोड़कर दिखाना, जिन पर गंभीर आरोप लगे हैं, निश्चित रूप से एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।   यह विवाद केवल पोस्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। भारतीय राजनीति में पोस्टर, होर्डिंग और सार्वजनिक संदेश लंबे समय से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन जब इनमें प्रयुक्त भाषा “देशद्रोही” जैसे शब्दों तक पहुंच जाती है, तो यह बहस और भी तीखी हो जाती है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है और असहमति को देशविरोध से जोड़ना स्वस्थ परंपरा नहीं है।   कांग्रेस की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से विस्तृत बयान सामने न भी आया हो, लेकिन पार्टी नेताओं ने अनौपचारिक तौर पर इसे “ध्यान भटकाने की कोशिश” बताया है। उनका तर्क है कि विपक्ष का विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है और उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश को बदनाम करने की साजिश बताना अनुचित है। वहीं बीजेपी का कहना है कि विरोध का अधिकार है, लेकिन उसकी टाइमिंग और तरीका राष्ट्रहित के खिलाफ नहीं होना चाहिए।   इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू यह है कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अन्य मामले में टिप्पणी करते हुए कहा था कि “सड़क को मौत का गड्ढा नहीं बनने दिया जा सकता।” यह टिप्पणी भले ही ठेकेदारों को अग्रिम जमानत से इनकार के संदर्भ में थी, लेकिन राजनीतिक बहस के बीच इसे भी कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक जिम्मेदारी के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। राजनीतिक दल अक्सर ऐसे न्यायिक बयानों को अपने-अपने तर्कों के समर्थन में उद्धृत करते हैं।   उमर खालिद का नाम 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में सामने आया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए थे। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है। दूसरी ओर राहुल गांधी लंबे समय से केंद्र सरकार की आर्थिक, सामाजिक और विदेश नीति पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में दोनों को एक ही फ्रेम में रखकर तुलना करना राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील कदम माना जा रहा है।   पोस्टर की हेडलाइन—“एक अराजक तरीका, देशद्रोहियों के अलग-अलग चेहरे”—ने विवाद को और बढ़ा दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि किसी निर्वाचित सांसद और नेता प्रतिपक्ष को “देशद्रोही” कहना लोकतांत्रिक संस्थाओं का अपमान है। वहीं बीजेपी का पक्ष है कि यह राजनीतिक टिप्पणी है और पार्टी अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है।   राजनीतिक रणनीति के नजरिए से देखें तो ऐसे पोस्टर अक्सर समर्थकों को एकजुट करने और विरोधियों पर वैचारिक हमला करने के लिए लगाए जाते हैं। खासकर जब अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम या बड़े कूटनीतिक आयोजन हो रहे हों, तब सरकारें और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीतिक रेखाएं स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। इस मामले में भी एआई समिट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी को केंद्र में रखकर बहस को राष्ट्र की छवि बनाम विरोध की राजनीति के रूप में पेश किया गया है।   आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या कानूनी और संसदीय स्तर तक पहुंचता है। यदि कांग्रेस औपचारिक आपत्ति दर्ज कराती है या चुनाव आयोग अथवा अन्य मंचों पर शिकायत करती है, तो मामला और गहरा सकता है। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में लगाया गया यह पोस्टर राष्ट्रीय स्तर की बहस का विषय बन चुका है।   समग्र रूप से देखें तो यह प्रकरण भारतीय राजनीति में बढ़ती वैचारिक ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति को दर्शाता है। जहां एक ओर सत्तारूढ़ दल विपक्ष की गतिविधियों को राष्ट्रहित के संदर्भ में परखने की बात करता है, वहीं विपक्ष इसे असहमति की आवाज दबाने का प्रयास बताता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और प्रतिरोध की अपनी जगह है, लेकिन उसकी भाषा, समय और स्वरूप को लेकर हमेशा बहस होती रही है।   दिल्ली के इस पोस्टर विवाद ने एक बार फिर यही प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या राजनीतिक असहमति को देशविरोध से जोड़ना उचित है, या यह लोकतांत्रिक विमर्श को और अधिक कठोर बना देता है? आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है, क्योंकि दोनों ही पक्ष इसे अपने-अपने समर्थकों के बीच बड़े नैरेटिव के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

Metroheadlines फ़रवरी 26, 2026 0

MP के विकास को मिली गति! गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी

0 Comments