नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया है, जिससे बिहार की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है. लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार की त्रयी ने पिछले पांच दशकों तक बिहार की राजनीति को नियंत्रित किया.
'मैं आपको पूरी ईमानदारी से विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आपके साथ मेरा यह संबंध भविष्य में भी बना रहेगा और आपके साथ मिलकर एक विकसित बिहार बनाने का संकल्प पूर्ववत कायम रहेगा. जो नई सरकार बनेगी उसको मेरा पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा

ये बातें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं. नीतीश कुमार ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखी इन लाइनों के आइने में बिहार के राजनीतिक अध्याय से एक चैप्टर के अंत के आगमन की आवाभगत कर सकते हैं.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार की मिट्टी छोड़कर अब राज्यसभा की शोभा बढ़ाएंगे उन्होंने एक्स पर 10 बजकर 54 मिनट पर लिखा- `पिछले दो दशक से भी अधिक समय से आपने अपना विश्वास एवं समर्थन मेरे साथ लगातार बनाए रखा है, तथा उसी के बल पर हमने बिहार की और आप सब लोगों की पूरी निष्ठा से सेवा की है.
नीतीश के राज्यसभा जाने से एक युग का अंत
आपके विश्वास और समर्थन की ही ताकत थी कि बिहार आज विकास और सम्मान का नया आयाम प्रस्तुत कर रहा है. इसके लिए पूर्व में भी मैंने आपके प्रति कई बार आभार व्यक्त किया है. संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूं. इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूं
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक्स पर ये बयान आने के बाद सभी सियासी अटकलबाजी थम सी गई है. उसके साथ ही लालू यादव, रामविलास पासवान और अब नीतीश कुमार के युग के अंत की तस्वीर एक फ्रेम में आ गई है. बिहार की राजनीतिक मिट्टी में एक ऐसी खुशबू रही है जिसने देश को जयप्रकाश नारायण (जेपी) जैसा व्यक्तित्व दिया.
नीतीश कुमार की सियासी पारी का आगाज
1970 के दशक के उस छात्र आंदोलन की कोख से तीन बड़े नायक निकले. लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार. इन तीनों ने मिलकर बिहार की सत्ता और सामाजिक ताने-बाने को पिछले पांच दशकों तक अपने इर्द-गिर्द घुमाया.
लेकिन आज, जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े हैं, तो बिहार की राजनीति का वह `समाजवादी अध्याय` अब अपना अंतिम पन्ना लिख चुका है. यह अंत सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि उस विचारधारा के अवसान का भी है जिसने `राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होगा` का नारा दिया था. आइए कुछ पीछे चलते हैं.
सामाजिक न्याय कैसे परिवारवाद में बदला
इस कहानी की शुरुआत 10 मार्च, 1990 को हुई थी, जब लालू प्रसाद यादव ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. वह दौर बदलाव का था. सदियों से हाशिए पर पड़े पिछड़ों और दलितों को लालू ने आवाज दी. उनके शासन के शुरुआती साल सामाजिक न्याय के चरम के रूप में देखे गए. लेकिन, सत्ता का नशा और भ्रष्टाचार के आरोपों (चारा घोटाला) ने इस नायक को कानून के शिकंजे में ला खड़ा किया.
1997 में जब जेल जाने की नौबत आई, तो लालू ने जिस परिवारवाद का विरोध किया था, उसी का सहारा लिया. उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया. अखबारों की पुरानी कतरनें गवाह हैं कि उस वक्त नीतीश कुमार ने तंज कसते हुए कहा था, “राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने के बाद मेरी इस पद में कोई रुचि नहीं रही.' यह बयान उस समय के नीतीश के आदर्शों का प्रतीक था.
लालू से पासवान तक की परिवारवादी राजनीति
हालांकि, लालू का परिवारवाद यहीं नहीं रुका. आज उनकी पूरी विरासत उनके बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों (मीसा भारती और रोहिणी आचार्या) के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है. तेजस्वी यादव भले ही आज राजद को एक नए और युवा स्वरूप में पेश कर रहे हों, लेकिन पार्टी की चाबी आज भी उसी `लालू परिवार` के पास है.
इसी त्रयी के दूसरे स्तंभ थे रामविलास पासवान. उन्होंने दलित चेतना को मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा. वह केंद्र की राजनीति के `मौसम विज्ञानी` कहे जाते थे, जो हवा का रुख भांपकर गठबंधन बदलने में माहिर थे.
पासवान ने भी सार्वजनिक मंचों से परिवारवाद पर कड़े प्रहार किए, लेकिन जमीन पर उन्होंने अपने भाइयों और फिर अपने बेटे चिराग पासवान को राजनीति की सीढ़ियां चढ़ाईं. 2020 में उनके निधन के बाद लोजपा दो फाड़ हुई, लेकिन उनके परिवार का दबदबा बरकरार रहा. आज चिराग पासवान एनडीए के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जो अपने पिता की विरासत को `हनुमान` बनकर आगे बढ़ा रहे हैं
नीतीश कुमार कैसे बने सुशासन बाबू
अब बात आती है नीतीश कुमार की, जिन्हें सुशासन बाबू कहा गया. उन्होंने लालू के `जंगलराज` के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बिहार को बुनियादी ढांचे, सड़क और बिजली के मामले में एक नई पहचान दी. नीतीश की राजनीति हमेशा `नीति और नियत` के दावों पर टिकी रही.
उन्होंने लंबे समय तक खुद को परिवारवाद से दूर रखा. उनका बेटा निशांत कुमार, जो एक इंजीनियरिंग स्नातक हैं, सालों तक राजनीति की चकाचौंध से दूर आध्यात्मिक और निजी जीवन जीते रहे. अब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं.
बेटे निशांत सक्रिय रूप से नेताओं से मिल रहे हैं. उधर, बीजेपी की रणनीति पूर्व में भी कुछ ऐसी ही थी. आपको याद होगा, 2022 में नीतीश कुमार को राज्यसभा के जरिए उपराष्ट्रपति बनाने तक की बात हुई थी. कमोवेश इस बात पर मुहर लग गई थी कि नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं
नीतीश के सियासी उत्तराधिकारी होंगे निशांत
बिहार की राजनीति के केंद्र में बीजेपी रहेगी. नीतीश कुमार को अब दिल्ली में उपराष्ट्रपति बनाकर बैठा दिया जाएगा. लेकिन ठीक ऐन वक्त पर नीतीश कुमार ने महागठबंधन का दामन थामा. और बिहार के मुख्यमंत्री बन गए.
उधर, बीजेपी की रणनीति भी यहां स्पष्ट है. नीतीश को केंद्र में एक सम्मानजनक विदाई देकर बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में खुद का मुख्यमंत्री बनाना. यदि निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो यह नीतीश के लिए अपने बेटे को सुरक्षित राजनीतिक जमीन देने का सबसे बड़ा दांव होगा.
बिहार में आज जो संक्रमण काल चल रहा है, वह मंडल कमीशन के बाद की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ है. लालू, पासवान और नीतीश ने जाति को अपनी शक्ति बनाया. लालू ने यादवों को, नीतीश ने कुर्मी और ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) को, तो पासवान ने दलितों को लामबंद किया. लेकिन 2026 का बिहार अब बदल रहा है.
अमित शाह और पीएम मोदी हिंदू एकीकरण और विकास के जरिए जाति की इन दीवारों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वे कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर नीतीश के ईबीसी वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं.
तेजस्वी यादव अब केवल जाति की नहीं, बल्कि `नौकरी` और `आर्थिक न्याय` की बात कर रहे हैं. `जन सुराज` के माध्यम से प्रशांत किशोर बिहार के युवाओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि लालू-नीतीश के 35-40 सालों ने बिहार को पिछड़ेपन के अलावा कुछ नहीं दिया.
बिहार की राजनीति में लिखी जाएगी नई पठकथा
लालू का 1990 का शपथ ग्रहण समारोह जिस क्रांति का आगाज़ था, वह आज परिवारवाद के दलदल में ठहरा हुआ महसूस होता है. नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और निशांत कुमार का उदय इस बात की तस्दीक है कि अब बिहार की राजनीति के पुराने शेर थक चुके हैं. उनकी आंखें अब सामाजिक न्याय के सपनों के बजाय अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित देखने में ज्यादा लगी हैं
यह बिहार की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म होने जैसा है. आने वाले वर्षों में बिहार `जाति बनाम विकास` की एक नई लड़ाई देखेगा. क्या बिहार के लोग अब भी उन्हीं पुराने नामों के उत्तराधिकारियों को चुनेंगे, या फिर किसी नई विचारधारा को मौका देंगे? यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि लालू-पासवान-नीतीश की वह त्रयी, जिसने दशकों तक बिहार को अपनी उंगलियों पर नचाया, अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रही है.
Rashmika-Vijay Announcement: रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा ने शादी के बाद एक बड़ी अनाउंसमेंट कर हर किसी का दिल जीत लिया. इसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा 44 सरकारी स्कूलों को स्कॉलरशिप देंगे न्यूली वेड कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों जहां अपनी शादी को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. वहीं ये जोड़ी अपनी वेडिंग सेलिब्रेशन के बीच तेलंगाना में एक के बाद एक समाज सेवा के काम कर सबका दिल जीत रहे हैं. अब इस कपल ने तेलंगाना के 44 सरकारी स्कूलों के लिए बड़ी अनाउंसमेंट की है. तेलंगाना के 44 सरकारी स्कूलों के लिए विजय-रश्मिका की बड़ी अनाउंसमेंट दरअसल उदयपुर में शादी करने के बाद रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा नागरकुरनूल ज़िले के अचमपेट डिवीज़न में एक्टर के पैतृक गांव पहुंचे थे. वहां के लोगों से बातचीत के दौरान, एक्टर ने एक ज़रूरी घोषणा की, जिस पर वहां जमा भीड़ ने ज़ोरदार तालियां बजाईं. बता दें कि अपने एनजीओ, देवरकोंडा चैरिटेबल ट्रस्ट के ज़रिए, विजय ने इलाके के 44 सरकारी स्कूलों में क्लास 9 और 10 में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप देने की घोषणा की है. इस पहल का मकसद जरूरतमंद स्टूडेंट्स की मदद करना और उन्हें बिना किसी पैसे की दिक्कत के अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए बढ़ावा देना है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में विजय तेलुगु में गांववालों से बात करते हुए दिख रहे हैं, जिसमें वह अपने शहर के स्टूडेंट्स के लिए अपना कमिटमेंट बता रहे हैं. उन्होंने कम्युनिटी को भरोसा दिलाया कि स्कॉलरशिप से सीधे तौर पर उन टीनएजर्स को फ़ायदा होगा जो ज़रूरी बोर्ड एग्ज़ाम की तैयारी कर रहे हैं. विजय ने अपने गांव में ज्यादा बार आने का भी वादा किया, ताकि उस कम्युनिटी के साथ उनका रिश्ता और मजबूत हो सके जिसने उनके शुरुआती सालों को बनाया था शादी की रस्में रश्मिका और विजय ने 26 फरवरी को उदयपुर में तेलुगु और कोडवा रीति-रिवाजों से शादी की थी. इसके बाद, कपल ने तिरुपति बालाजी मंदिर में आशीर्वाद लिया था. उन्होंने अपनी शादी को सेलिब्रेट करते हुए कई शहरों में मिठाइयां भी बांटीं. 2 मार्च को, रश्मिका ने तेलंगाना के थुम्मानपेटा में विजय के घर पर अपनी गृहप्रवेश सेरेमनी की. कपल ने अपने नए घर पर सत्यनारायण व्रतम पूजा भी की. रश्मिका ने इस मौके पर क्रीम कांजीवरम साड़ी पहनी थी, जबकि विजय ने गांव में बातचीत के दौरान ऑरेंज टी-शर्ट और ब्लैक ट्राउजर में सिंपल लुक कैरी किया था. कब है विजय-रश्मिका का रिसेप्शन यह कपल 4 मार्च को हैदराबाद में इंडस्ट्री के साथियों और पॉलिटिकल लीडर्स के लिए एक ग्रैंड रिसेप्शन होस्ट करने वाला है. हालांकि, उन्होंने साफ किया है कि यह इवेंट सिर्फ़ इनविटेशन पर ही होगा, और फैंस और मीडिया से सिक्योरिटी इंतज़ाम का ध्यान रखने की रिक्वेस्ट की है. विजय-रश्मिका फिल्म प्रोफेशनल फ्रंट की बात करें तो ये जोड़ी जल्द ही राणाबली में स्क्रीन स्पेस शेयर करती नजर आएगी. ये फिल्म 11 सितंबर को थिएटर में रिलीज़ होगी.
भारत और इंग्लैंड के बीच टी20 वर्ल्ड कप 2026 का सेमीफाइनल 5 मार्च को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. भारत ग्रुप-1 में दूसरे स्थान पर रहा है, जबकि साउथ अफ्रीका शीर्ष पर रही. IND vs ENG Semifinal Live Streaming: आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत सेमीफाइनल में पहुंच चुका है. टीम इंडिया ने 1 मार्च को वेस्टइंडीज को रोमांचक मुकाबले में पांच विकेट से हराकर अंतिम चार में एंट्री की. इस जीत के हीरो रहे संजू सैमसन, जिन्होंने नाबाद 97 रन की बेहतरीन पारी खेली. उनकी पारी में 12 चौके और 4 छक्के शामिल रहे और उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया. भारत ग्रुप-1 में दूसरे स्थान पर रहा, जबकि साउथ अफ्रीका शीर्ष पर रही. अब सेमीफाइनल में भारत का सामना ग्रुप-2 की टॉपर इंग्लैंड से होने जा रहा है. पहला सेमीफाइनल साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड के बीच खेला जाएगा. दोनों मुकाबलों के विजेता 8 मार्च को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में फाइनल खेलेंगे. IND VS ENG मैच कब और कितने बजे होगा? भारत और इंग्लैंड के बीच दूसरा सेमीफाइनल 5 मार्च, गुरुवार को खेला जाएगा. मैच भारतीय समयानुसार शाम 7 बजे शुरू होगा, जबकि टॉस 6:30 बजे होगा. यह मुकाबला बेहद हाई-वोल्टेज माना जा रहा है, क्योंकि दोनों टीमें लगातार तीसरी बार टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में आमने-सामने हैं. IND VS ENG मैच कहां खेला जाएगा? यह अहम सेमीफाइनल मुंबई के ऐतिहासिक वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. इस मैदान पर बड़े मुकाबलों का लंबा इतिहास रहा है और फैंस को एक बार फिर रोमांचक क्रिकेट की उम्मीद है. IND VS ENG मैच कहां देखें लाइव? भारत बनाम इंग्लैंड सेमीफाइनल का सीधा प्रसारण स्टार स्पोर्ट्स नेटवर्क पर किया जाएगा. वहीं ऑनलाइन दर्शक इस मुकाबले की लाइव स्ट्रीमिंग जियो हॉटस्टार ऐप और वेबसाइट पर देख सकेंगे. दोनों टीमों के स्क्वॉड भारत: सूर्यकुमार यादव (कप्तान), संजू सैमसन, अक्षर पटेल, कुलदीप यादव, हार्दिक पांड्या, जसप्रीत बुमराह, ईशान किशन, रिंकू सिंह, मोहम्मद सिराज, वॉशिंगटन सुंदर, शिवम दुबे, अभिषेक शर्मा, वरुण चक्रवर्ती, अर्शदीप सिंह और तिलक वर्मा. इंग्लैंड: हैरी ब्रूक (कप्तान), रेहान अहमद, जोफ्रा आर्चर, टॉम बैंटन, जैकब बेथेल, जोस बटलर, सैम करन, लियाम डॉसन, बेन डकेट, विल जैक्स, जेमी ओवरटन, आदिल राशिद, फिल सॉल्ट, जोश टंग और ल्यूक वुड.
Dhurandhar 2 Advance Booking: रणवीर सिंह की धुरंधर 2 बॉलीवुड की सबसे ज़्यादा प्रीमियर सेल्स का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी है. हालांकि ये एक साउथ हीरो की फिल्म को मात नहीं दे पा रही है. रणवीर सिंह, संजय दत्त, आर माधवन और अर्जुन रामपाल स्टारर ‘धुरंधर 2’ ने सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले ही गदर मचाया हुआ है. फिलहाल ये 18 मार्च, 2026 को होने वाले पेड प्रीव्यू शो के लिए एडवांस बुकिंग में गर्दा उड़ा रही है. वैसे ये फिल्म पहले ही 'स्त्री 2' के पेड प्रीव्यू शो को रिकॉर्ड को मिट्टी में मिलाकर बॉलीवुड के लिए इतिहास रच चुकी है. लेकिन आदित्य धर निर्देशित इस फिल्म के साउथ के एक स्टार का रिकॉर्ड तोड़ने में पसीने छूट रहे हैं. धुरंधर 2 ने पेड प्रीव्यू के लिए एडवांस बुकिंग में कितनी कर ली है कमाई? धुरंधर को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता मिली थी. ऐसे में इसकी सीक्वल धुरंधर द रिवेंज या धुरंधर 2 को भी अच्छा रिस्पॉन्स मिलने की तो पूरी उम्मीद है ही लेकिन ये फिल्म तो रिलीज से पहले ही कमाल कर रही है और बड़े-बड़े रिकॉर्ड भी अपने नाम कर रही है. सैकनिल्क के मुताबिक, इसने पेड प्रीव्यू से अब तक 18.78 करोड़ (ब्लॉक्ड सीटों को छोड़कर) कमा लिएए हैं वहीं ब्लॉक सीटों के साथ इसका पेड प्रीव्यू के लिए प्री टिकट सेल का कलेक्शन 23.99 करोड़ पहुंच चुका है. देश भर में 8 हजार 31 शोज के लिए इसके 3 लाख 51 हजार 4 सौ 13 टिकट बिक चुके हैं. धुरंधर 2 ने स्त्री 2 को पछाड़ बनाया नया रिकॉर्ड बता दें कि कि 2024 में, राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की स्त्री 2 ने इंडिया में पेड प्रीव्यू में 9.40 करोड़ की नेट कमाई करके नया माइलस्टोन हासिल किया था. लेकिन धुरंधर: द रिवेंज ने एडवांस बुकिंग में इससे कई गुना ज़्यादा सेल्स के साथ इसे धूल चटा दी है. इसकी के साथ .े बॉलीवुड के इतिहास में सबसे ज़्यादा प्रीमियर सेल्स का नया रिकॉर्ड अपने नाम भी कर चुकी है. धुरंधर 2 के पवन कल्याण की OG को मात देने में छूटे पसीने इन सबके बीच गौर करने वाली बात ये है कि धुरंधर 2 ने पेड पीव्यू के लिए प्री सेल्स में बेशक धमाकेदार कमाई कर ली हैं लेकिन इसका टारगेट इंडियन सिनेमा की सबसे बड़ी पेड प्रीव्यू कमाई का रिकॉर्ड अपने नाम करना है. दरअसल पवन कल्याण की दे कॉल हिम OG ने 21 करोड़ के बड़े नेट कलेक्शन के साथ किसी इंडियन फिल्म के लिए अब तक के सबसे ज़्यादा पेड प्रीव्यू अपने नाम किए हुए हैं. फिलहाल रणवीर सिंह स्टारर धुरंधर 2 के लिए इस रिकॉर्ड को तोड़ने में पसीने छूट रहे हैं. हालांकि अभी फिल्म के पेड प्रीव्यू शो में 6 दिन बचे हैं और इसे पवन कल्याण के रिकॉर्ड को मात देने से सिर्फ 3 करोड़ के करीब पीछे है. इसलिए पूरी उम्मीद है कि धुरंधर 2 इस उपलब्धि को हासिल कर इतिहास रच सकती है.
Bihar New CM: नीतीश कुमार के बाद अब बिहार में बीजेपी का सीएम बनना लगभग तय है. सूत्रों ने बताया कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल तक सीएम पद पर बने रहेंगे, वो तुरंत पद से इस्तीफा नहीं देंगे. बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय, कब होगा नई सरकार का गठन? जानिए पूरा राजनीतिक घटनाक्रम बिहार की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने हाल ही में राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया है, जिसके बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे और राज्य में नई सरकार का गठन होगा। नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है—क्या राज्य को पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मुख्यमंत्री मिलेगा? क्या एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन बदलने वाला है? और आखिर नई सरकार का गठन कब होगा? इन सभी सवालों पर सियासी गलियारों में तेजी से चर्चा चल रही है। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना क्यों बड़ा फैसला माना जा रहा नीतीश कुमार वर्ष 2005 से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और वे कई बार मुख्यमंत्री बने। हाल ही में 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बड़ी जीत दिलाने के बाद उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन अब उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया है। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बिहार की सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम एनडीए के भीतर एक नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें बीजेपी अब सीधे राज्य की कमान संभालना चाहती है। नीतीश कुमार ने स्वयं कहा है कि वे राज्य में बनने वाली नई सरकार को पूरा सहयोग और मार्गदर्शन देंगे। इसका मतलब यह है कि वे सक्रिय रूप से बिहार की राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं होंगे, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी किसी और नेता के हाथ में होगी। नई सरकार का गठन कब होगा? राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। बताया जा रहा है कि वे लगभग 10 अप्रैल तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं और उसके बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होगी। दरअसल, राज्यसभा का नया कार्यकाल अप्रैल से शुरू होने वाला है। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि उसी समय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होगी। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक बिहार में नई सरकार के गठन की औपचारिक घोषणा हो सकती है। इस दौरान एनडीए के शीर्ष नेताओं के बीच कई दौर की बैठकों का सिलसिला भी चल रहा है। इन बैठकों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और नए मंत्रिमंडल की रूपरेखा पर चर्चा की जा रही है। क्या बिहार को पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री मिलेगा? अगर नीतीश कुमार पद छोड़ते हैं और बीजेपी का नेता मुख्यमंत्री बनता है तो यह बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा। अभी तक राज्य में बीजेपी सहयोगी दल के रूप में सत्ता में रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पद उसके पास कभी नहीं रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा और पार्टी अब राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। इसलिए यह संभावना काफी बढ़ गई है कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से ही होगा। संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन-कौन? नीतीश कुमार के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। इनमें बीजेपी और एनडीए के कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं। 1. सम्राट चौधरी सम्राट चौधरी वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं और बीजेपी के बड़े ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं। संगठन और राजनीति दोनों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। 2. नित्यानंद राय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी संभावित उम्मीदवारों में शामिल हैं। वे लंबे समय से बीजेपी के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और बिहार में पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं। 3. कोई नया चेहरा राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि बीजेपी किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है। इससे सामाजिक समीकरण साधने और आगामी चुनावों की रणनीति मजबूत करने की कोशिश हो सकती है। एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन कैसे बदलेगा? अगर बीजेपी मुख्यमंत्री पद संभालती है तो एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव होगा। अभी तक जेडीयू के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चल रही थी। नीतीश कुमार लंबे समय तक बिहार की राजनीति में ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहे हैं। लेकिन उनके राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी की भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही जेडीयू के भविष्य को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में जेडीयू और बीजेपी के बीच नए समीकरण बन सकते हैं। विपक्ष की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि जनता ने जिस चेहरे पर वोट दिया था, वही मुख्यमंत्री पद छोड़ रहा है, जो लोकतांत्रिक नैतिकता के खिलाफ है। कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि बीजेपी ने राजनीतिक रणनीति के तहत सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई है। हालांकि एनडीए के नेता इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं। बिहार की राजनीति पर संभावित असर नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो सकता है। लगभग 20 साल तक राज्य की राजनीति का केंद्र रहे नेता के हटने से सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। इसके कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं: बीजेपी का प्रभाव बढ़ेगा जेडीयू की भूमिका बदल सकती है विपक्ष नई रणनीति बना सकता है सामाजिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है क्या नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ेगी? नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। वे पहले भी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनका अनुभव काफी लंबा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में उनकी उपस्थिति एनडीए के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकती है। बिहार में सत्ता परिवर्तन क्यों अहम है? बिहार भारत के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। यहां होने वाला कोई भी बड़ा राजनीतिक बदलाव राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करता है। अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि अब तक बिहार उन कुछ हिंदीभाषी राज्यों में शामिल था जहां बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं रहा था। आने वाले दिनों में क्या होगा? अगले कुछ सप्ताह बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। संभावित घटनाक्रम इस प्रकार हो सकते हैं: नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे एनडीए विधायक दल की बैठक होगी नए मुख्यमंत्री का चयन होगा नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होगा राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, अप्रैल के आसपास यह पूरी प्रक्रिया पूरी हो सकती है।
MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे. Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है. रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे. गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.
Mallikarjun Kharge on PM Modi: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पीएम नरेंद्र मोदी को लेकर दिए बयान के बाद राजनीतिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिया गया विवादित बयान भारतीय राजनीति में एक नए टकराव का कारण बन गया है, खासकर जब देश Assembly Elections 2026 की तैयारी के दौर से गुजर रहा है। मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने बयान में खरगे ने पीएम मोदी को “आतंकवादी” तक कह दिया, जिससे सियासी माहौल अचानक गरमा गया। इस बयान के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे बेहद आपत्तिजनक, गैर-जिम्मेदाराना और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया हो, बल्कि उनके अनुसार, अब तक कांग्रेस द्वारा मोदी के खिलाफ 175 से अधिक अपमानजनक टिप्पणियां की जा चुकी हैं। यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं। ऐसे संवेदनशील समय में इस तरह के व्यक्तिगत हमले राजनीतिक विमर्श के स्तर को गिराने वाले माने जा रहे हैं। भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस मुद्दों पर बहस करने के बजाय व्यक्तिगत आरोपों और अपशब्दों का सहारा ले रही है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। पार्टी ने यह भी मांग की कि खरगे को अपने बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। दूसरी ओर, कांग्रेस की तरफ से इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ नेताओं ने इसे खरगे की व्यक्तिगत राय बताया, जबकि कुछ ने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से हटाकर पेश किया जा रहा है। कांग्रेस का तर्क है कि वह सरकार की नीतियों और फैसलों की आलोचना करती रही है और आगे भी करती रहेगी, लेकिन भाजपा इस आलोचना को व्यक्तिगत हमले के रूप में पेश कर रही है ताकि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके। पार्टी के प्रवक्ताओं ने यह भी कहा कि भाजपा बार-बार पुराने बयानों को गिनाकर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकते हैं, जहां नेताओं द्वारा तीखी भाषा का इस्तेमाल कर अपने समर्थकों को सक्रिय करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है, क्योंकि आम मतदाता अब विकास, रोजगार, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। ऐसे में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप कई बार उल्टा असर भी डाल सकते हैं और जनता में राजनीतिक दलों के प्रति निराशा बढ़ा सकते हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक संवाद का स्तर हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। समय-समय पर नेताओं द्वारा एक-दूसरे पर तीखे हमले किए जाते रहे हैं, लेकिन जब यह भाषा मर्यादा की सीमा पार करती है, तो व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ता है। इस मामले में भी कई गैर-राजनीतिक हस्तियों और सामाजिक संगठनों ने संयमित भाषा के इस्तेमाल की अपील की है। उनका कहना है कि नेताओं को अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि उनके बयान समाज पर व्यापक प्रभाव डालते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारतीय राजनीति में स्वस्थ और मुद्दा-आधारित बहस की जगह कम होती जा रही है? जहां एक ओर सत्तारूढ़ दल विपक्ष पर आरोप लगाता है कि वह केवल नकारात्मक राजनीति कर रहा है, वहीं विपक्ष का कहना है कि सरकार आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पा रही और हर असहमति को देशविरोध या व्यक्तिगत हमले के रूप में पेश करती है। इस टकराव के बीच असली मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मल्लिकार्जुन खरगे अपने बयान पर कायम रहते हैं या किसी तरह की सफाई या माफी सामने आती है। साथ ही, भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को चुनावी प्रचार में किस तरह इस्तेमाल करती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल इतना तय है कि इस बयान ने राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है और चुनावी माहौल को और अधिक तीखा बना दिया है।
केरल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है, जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने Thrissur में एक भव्य रोड शो कर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। इस रोड शो की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी साफ तौर पर देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री ने खुद इस रोड शो की झलकियां साझा करते हुए लोगों का आभार व्यक्त किया और इसे “अविस्मरणीय” बताया। उनके इस संदेश ने साफ कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस बार केरल में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 🔸 रोड शो में उमड़ा जनसैलाब Thrissur की सड़कों पर प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के लिए हजारों लोग जुटे। हर तरफ पार्टी के झंडे, पोस्टर और नारों की गूंज सुनाई दे रही थी। लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला, खासकर युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के बीच। रोड शो के दौरान प्रधानमंत्री का काफिला धीरे-धीरे आगे बढ़ा, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों का अभिवादन कर सकें। लोग सड़क के दोनों ओर खड़े होकर उनका स्वागत कर रहे थे, वहीं कई जगहों पर फूलों की वर्षा भी की गई। यह रोड शो केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि BJP अब केरल जैसे राज्य में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है। 🔸 सोशल मीडिया पर छाया रोड शो प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर इस रोड शो के वीडियो और तस्वीरें साझा कीं। उन्होंने लिखा कि यह अनुभव उनके लिए बेहद खास और यादगार रहा। इस पोस्ट के सामने आते ही लाखों लोगों ने इसे लाइक और शेयर किया। ट्विटर (अब X) पर यह पोस्ट तेजी से ट्रेंड करने लगी। इससे साफ जाहिर होता है कि यह रोड शो सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी काफी सफल रहा। 🔸 केरल में BJP की रणनीति केरल पारंपरिक रूप से Bharatiya Janata Party के लिए चुनौतीपूर्ण राज्य रहा है, जहां मुख्य मुकाबला वामपंथी दलों और कांग्रेस के बीच होता रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में BJP ने यहां अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री का यह रोड शो भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। Thrissur को खास तौर पर इसलिए चुना गया क्योंकि यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। BJP का लक्ष्य इस बार केरल में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाना और राज्य की राजनीति में एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभरना है। 🔸 चुनावी संकेत और राजनीतिक संदेश इस रोड शो के जरिए प्रधानमंत्री मोदी ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि BJP अब केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत में भी अपनी जड़ें मजबूत कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बड़े रोड शो मतदाताओं पर सीधा प्रभाव डालते हैं और पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरते हैं। इसके अलावा, यह रोड शो विपक्षी दलों के लिए भी एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि BJP अब केरल में भी गंभीरता से चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। 🔸 जनता की प्रतिक्रिया रोड शो के दौरान लोगों की भारी भीड़ यह संकेत देती है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता अभी भी बरकरार है। खासकर युवा वर्ग में उनका क्रेज साफ नजर आया। कई लोगों ने इसे “ऐतिहासिक” बताया, वहीं कुछ ने इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा माना। हालांकि, इसमें कोई शक नहीं कि इस आयोजन ने केरल की राजनीति में नई ऊर्जा भर दी है। തൃശ്ശൂർ, നന്ദി! ഇന്നലെ നടന്ന റോഡ് ഷോ മറക്കാനാവാത്തതായിരുന്നു. ഇതാ പ്രധാന ഹൈലൈറ്റുകൾ… pic.twitter.com/DAiMyO1JLT — Narendra Modi (@narendramodi) March 30, 2026
चुनाव आयोग ने असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद आदर्श आचार संहिता (MCC) के सख्त निर्देश जारी किए हैं। चुनाव आयोग ने असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) के सख्त क्रियान्वयन के निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने बताया कि 5,173 से अधिक उड़न दस्ते और 5,200 से अधिक स्थिर निगरानी टीमों (एसएसटी) को राज्यों/केंद्र शासित क्षेत्रों में तैनात किया गया है ताकि शिकायतों का समाधान 100 मिनट के भीतर किया जा सके। एक दिन पहले आयोग ने इन राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्र में विधानसभा चुनावों के लिए कार्यक्रम की घोषणा की थी। आयोग ने छह अन्य राज्यों में भी आचार संहिता लागू करने के निर्देश दिए हैं, जहां इसी अवधि के दौरान आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होंगे। एमसीसी चुनावी राज्यों में केंद्र सरकार पर भी लागू होगा होगा यानी वह इनसे संबंधित घोषणाएं या नीतिगत फैसले नहीं ले पाएगी। चुनाव एलान के साथ ही विधायक-सांसदों के निधि जारी करने पर रोक लग गई है। चुनाव आयोग ने केंद्रीय मंत्रिमंडल सचिव और मुख्य सचिवों को लिखे पत्रों में चुनाव आचार संहिता के प्रविधानों को तुरंत प्रभाव से लागू करने को कहा है, जिसमें निजी और सार्वजनिक संपत्ति को विरूपित होने से रोकना, सार्वजनिक स्थानों का दुरुपयोग रोकना, सरकारी वाहनों का दुरुपयोग रोकना, सरकारी खर्चे पर विज्ञापन देना रोकना और सरकारी वेबसाइटों से राजनीतिक पदाधिकारियों की तस्वीरें हटाने के निर्देश शामिल हैं। चुनाव एलान के साथ ही विधायक-सांसदों के निधि जारी करने पर रोक चुनावी राज्यों में 5,200 से अधिक स्थिर निगरानी टीमें तैनात की गई आयोग ने कहा कि जिला स्तर पर 24 घंटे नियंत्रण कक्ष को तुरंत सक्रिय किया जाए जिसमें जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा पर्याप्त स्टाफ सुनिश्चित किया जाए। आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि मंत्रीगण अपनी आधिकारिक यात्राओं को चुनाव प्रचार से न जोड़ें और सरकारी मशीनरी का उपयोग चुनाव संबंधी गतिविधियों के लिए न करें। आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को चुनाव प्रक्रिया के दौरान उनकी जिम्मेदारियों की याद दिलाई। पार्टियों को सार्वजनिक बैठकों और जुलूसों के संबंध में पुलिस अधिकारियों को पूर्व में सूचित करना चाहिए ताकि यातायात प्रबंधन के लिए उचित व्यवस्था की जा सके। क्या है आदर्श आचार संहिता? आदर्श आचार संहिता के तहत वह नियम आते हैं जिसे चुनाव आयोग चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए गाइडलाइन के तौर पर जारी करता है। इसका उद्देश्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करना है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह राजनीतिक दलों एवं प्रत्याशियों के लिए बनाई गई एक नियमावली है जिसका पालन चुनाव के समय आवश्यक रूप से करना होता है। आचार संहिता चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद से लागू हो जाती है और चुनावी प्रक्रिया समाप्त होने तक लागू रहती है। एमसीसी लागू होने के बाद क्या होता है? धर्म, जाति या सांप्रदायिक भावनाओं के आधार पर कोई अपील नहीं की जा सकती। विरोधी की आलोचना केवल नीतियों, प्रदर्शन और कार्यक्रमों पर केंद्रित होनी चाहिए न कि उसके निजी जीवन पर। सरकारी जनसंचार माध्यमों का उपयोग सत्ताधारी दल के पक्ष में पक्षपातपूर्ण कवरेज के लिए नहीं किया जा सकता। मतदान केंद्रों के पास प्रलोभन देना, डराना-धमकाना, प्रचार करना जैसी अवैध गतिविधियां प्रतिबंधित होती हैं। निजी भवनों के बाहर प्रदर्शन करना या प्रचार के लिए किसी और की संपत्ति का उपयोग करना प्रतिबंधित है। दलों को बैठकों और जुलूसों के बारे में अधिकारियों को सूचित करना होगा। पहले से तय मार्गों, समय और शुरू/समाप्ति बिंदुओं का पालन करना होगा। दलों को अन्य जुलूसों के साथ टकराव से बचना होगा। लाउडस्पीकर या सभाओं के लिए अनुमति प्राप्त करनी होगी। शांति बनाए रखने और यातायात प्रबंधन के लिए पुलिस के निर्देशों का पालन करना होगा। दलों और उम्मीदवारों को मतदान के दौरान चुनाव अधिकारियों के साथ सहयोग करना होगा। मतदान केंद्रों के पास कोई शराब या भीड़भाड़ नहीं होनी चाहिए। सरकारें प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी, धन या पदों का उपयोग नहीं कर सकतीं। किसी भी तरह के वित्तीय अनुदान, नई परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे से जुड़े वादों या तदर्थ नियुक्तियों की कोई घोषणा नहीं की जाएगी, जोकि मतदाताओं को प्रभावित करती हो।