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नेपाल चुनाव-

भारत विरोधी ओली 4000 वोटों से पीछे:बालेन शाह से अपने गढ़ में मिल रही हार, 4 साल पुरानी पार्टी RSP सबसे आगे

Metroheadlines मार्च 6, 2026 0

 

नेपाल आम चुनाव 2026: बालेन शाह की RSP सबसे आगे, ओली अपने गढ़ में पीछे

 

नेपाल में हुए ताजा संसदीय चुनावों की मतगणना जारी है और शुरुआती रुझानों ने देश की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार रैपर से नेता बने और काठमांडू के लोकप्रिय मेयर रहे बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) चुनाव में सबसे आगे चल रही है। यह पार्टी केवल चार साल पहले बनी थी, लेकिन वर्तमान चुनाव में जिस तरह का समर्थन उसे मिल रहा है, वह नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

 

रुझानों के अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी एक सीट जीत चुकी है और 93 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। दूसरी ओर नेपाल की पुरानी और स्थापित पार्टी नेपाली कांग्रेस, जिसके प्रमुख नेताओं में गगन थापा शामिल हैं, एक सीट जीतने के साथ लगभग 10 सीटों पर आगे चल रही है। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (CPN-UML) भी करीब 9 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि केपी ओली अपने ही गढ़ झापा-5 सीट पर बालेन शाह से लगभग 4000 वोटों से पीछे चल रहे हैं।

 


 

नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव

 

नेपाल की राजनीति पिछले कई दशकों से कुछ चुनिंदा पार्टियों के बीच ही घूमती रही है। इनमें प्रमुख रूप से नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (CPN-UML) और माओवादी केंद्र जैसे दल शामिल रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में जनता के बीच इन पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष बढ़ा है।

 

भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक अस्थिरता, सरकारों का बार-बार गिरना और आर्थिक समस्याओं के कारण लोगों में नई राजनीतिक ताकतों की तलाश बढ़ी है। इसी माहौल में बालेन शाह और उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का उदय हुआ।

 

बालेन शाह ने पहले काठमांडू के मेयर चुनाव में जीत हासिल करके देशभर में लोकप्रियता हासिल की थी। उन्होंने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से अलग है और सीधे जनता के मुद्दों पर काम करता है।

 


 

बालेन शाह कौन हैं

 

बालेन शाह का असली नाम बालेन्द्र शाह है। वे पेशे से इंजीनियर हैं और युवाओं के बीच रैपर के रूप में भी काफी लोकप्रिय रहे हैं। उनकी छवि एक ईमानदार और आधुनिक सोच वाले नेता की है। काठमांडू के मेयर बनने के बाद उन्होंने शहर में कई प्रशासनिक सुधारों और विकास कार्यों की शुरुआत की, जिससे उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी 2022 में बनी थी। इतनी नई पार्टी होने के बावजूद वर्तमान चुनाव में जिस तरह का समर्थन उसे मिल रहा है, वह नेपाल की राजनीति में एक नई लहर का संकेत है।

 


 

केपी शर्मा ओली को बड़ा झटका

 

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली देश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक रहे हैं। वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (CPN-UML) के प्रमुख नेता हैं और कई बार प्रधानमंत्री पद संभाल चुके हैं।

लेकिन इस चुनाव में उन्हें अपने ही क्षेत्र झापा-5 में कठिन मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। शुरुआती रुझानों के अनुसार वे लगभग 4000 वोटों से पीछे चल रहे हैं। यह सीट उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण रही है क्योंकि उन्होंने 2017 और 2022 दोनों चुनाव इसी सीट से जीते थे।

अगर अंतिम परिणाम भी इसी दिशा में जाते हैं तो यह नेपाल की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जाएगा।

 



गगन थापा और नेपाली कांग्रेस की स्थिति

 

नेपाल की प्रमुख लोकतांत्रिक पार्टी नेपाली कांग्रेस भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। गगन थापा इस पार्टी के युवा और प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं।

शुरुआती रुझानों में नेपाली कांग्रेस एक सीट जीत चुकी है और लगभग 10 सीटों पर आगे चल रही है। हालांकि यह प्रदर्शन पार्टी की उम्मीदों से कम माना जा रहा है। नेपाली कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह इस चुनाव में बड़ी ताकत बनकर उभरेगी, लेकिन अभी तक के रुझान बताते हैं कि जनता का रुझान नई पार्टियों की ओर बढ़ रहा है।


 

नेपाल में मतदान प्रतिशत

 

नेपाल में इस बार चुनाव के दौरान मतदाताओं का उत्साह काफी देखने को मिला। चुनाव आयोग के अनुसार 60 प्रतिशत से अधिक लोगों ने मतदान किया। यह पिछले चुनावों की तुलना में बेहतर माना जा रहा है।

चुनाव के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। मतदान के बाद बैलट बॉक्स को सील कर सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया और अब उनकी गिनती की जा रही है।

चुनाव आयोग के अनुसार मतगणना पूरी होने में तीन से चार दिन का समय लग सकता है और कोशिश की जा रही है कि 9 मार्च तक सभी सीटों के परिणाम घोषित कर दिए जाएं।

 

चुनाव से पहले हुए हिंसक प्रदर्शन

 

नेपाल में चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल काफी तनावपूर्ण रहा था। पिछले साल सितंबर में कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों का मुख्य कारण सरकार की नीतियों और आर्थिक समस्याओं को माना जा रहा था।

कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए थे। इन घटनाओं के बाद चुनाव को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराना सरकार और चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती थी।

हालांकि चुनाव के दिन मतदान काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा और लोगों ने बड़ी संख्या में मतदान किया।

 


 

नेपाल-भारत संबंधों पर प्रभाव

 

नेपाल की राजनीति का असर भारत के साथ उसके संबंधों पर भी पड़ता है। केपी शर्मा ओली को अक्सर भारत विरोधी रुख अपनाने वाले नेता के रूप में देखा जाता रहा है। उनके कार्यकाल के दौरान नेपाल और भारत के संबंधों में कई बार तनाव देखने को मिला था।

यदि इस चुनाव में उनकी पार्टी कमजोर पड़ती है और नई राजनीतिक ताकतें सत्ता में आती हैं तो इससे नेपाल-भारत संबंधों में नए बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह जैसे नए नेता भारत और अन्य पड़ोसी देशों के साथ संतुलित और व्यावहारिक संबंध बनाने की कोशिश कर सकते हैं।

 


 

युवाओं की राजनीति में बढ़ती भूमिका

 

नेपाल के इस चुनाव की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें युवाओं की भूमिका काफी बढ़ गई है। बड़ी संख्या में युवा मतदाता नई पार्टियों और नए नेताओं का समर्थन करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी राजनीतिक अभियान चलाए गए, जिसने युवाओं को राजनीति से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई।

बालेन शाह की लोकप्रियता भी काफी हद तक युवाओं के बीच उनके प्रभाव के कारण है।


 

पारंपरिक राजनीति को चुनौती

 

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का उभार यह दिखाता है कि नेपाल की जनता अब पारंपरिक राजनीति से बदलाव चाहती है। दशकों से सत्ता में रहने वाली पार्टियों के खिलाफ लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

नई पार्टियां खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ और पारदर्शिता के समर्थक के रूप में पेश कर रही हैं। यही कारण है कि मतदाता उन्हें मौका देने के लिए तैयार दिख रहे हैं।


 

आगे क्या होगा

 

अभी मतगणना पूरी नहीं हुई है और अंतिम परिणाम आने में कुछ दिन लग सकते हैं। लेकिन शुरुआती रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि नेपाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।

यदि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी अपनी बढ़त बरकरार रखती है तो यह नेपाल के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक होगी। इससे देश में नई राजनीतिक दिशा तय हो सकती है।

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रश्मिका-विजय के रिसेप्शन में बिना चप्पल-जूते पहने पहुंचे रामचरण, वजह जान हो जाएंगे हैरान

  रश्मिका-विजय के रिसेप्शन में बिना चप्पल-जूते पहने पहुंचे रामचरण, वजह जान हो जाएंगे हैरान                                                                                                 Ramcharan: हैदराबाद में हुए ग्रैंड रिसेप्शन में रश्मिका और विजय ने खूब चर्चा बटोरी. हालांकि सबसे ज्यादा ध्यान राम चरण के अलग अंदाज ने खींचा, जहां वो काले कपड़ों और नंगे पैर में नजर आए.   साउथ फिल्म इंडस्ट्री के पॉपुलर कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. 4 मार्च को हैदराबाद में दोनों ने एक भव्य रिसेप्शन का आयोजन किया गया, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े सितारे शामिल हुए. इस खास मौके पर जहां हर कोई कपल को बधाई देने पहुंचा, वहीं एक्टर राम चरण अपने अनोखे अंदाज की वजह से सबसे ज्यादा चर्चा में आ गए.   नंगे पैर रिसेप्शन में आए रामचरण रिसेप्शन में राम चरण अपनी पत्नी उपासना के साथ पहुंचे थे. उन्होंने सिर से पैर तक काले रंग के कपड़े पहने हुए थे. लेकिन लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा इस बात ने खींचा कि वो बिना जूते-चप्पल के, यानी नंगे पैर ही कार्यक्रम में आए थे. उन्हें इस तरह देखकर कई लोग हैरान रह गए और सोशल मीडिया पर भी उनकी तस्वीरें तेजी से वायरल होने लगीं.   लेकिन इसके पीछे एक खास धार्मिक वजह है. राम चरण इन दिनों 'अयप्पा दीक्षा' का पालन कर रहे हैं. ये भगवान अयप्पा के भक्तों द्वारा किया जाने वाला एक कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है. इस व्रत के दौरान भक्तों को कुछ नियमों का सख्ती से पालन करना पड़ता है.   41 दिन की दीक्षा ले रहे रामचरण व्रत में काले या नीले रंग के कपड़े पहनना, सादगी से रहना और 41 दिनों तक नंगे पैर रहना शामिल होता है. इसी कारण राम चरण रिसेप्शन में भी बिना जूते के नजर आए. अयप्पा दीक्षा को अनुशासित और कठिन माना जाता है. इस बीच भक्तों को पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है. साथ ही मांसाहारी भोजन, शराब से दूर रहना और बाल या दाढ़ी भी नहीं कटवाना होता है. ये व्रत सबरीमाला मंदिर की यात्रा से पहले किया जाता है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब राम चरण इस तरह नंगे पैर नजर आए हों. इससे पहले 2023 में ऑस्कर समारोह में शामिल होने से पहले भी वह अयप्पा दीक्षा का पालन करते हुए दिखाई दिए थे.

1 मार्च से सिम कार्ड के बिना नहीं चलेगा वॉट्सएप:सरकार ने डेडलाइन बढ़ाने से मना किया; वेब वर्जन हर 6 घंटे में लॉग-आउट होगा

केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि 'सिम बाइंडिंग' के नियमों को लागू करने की 28 फरवरी की डेडलाइन नहीं बढ़ाई जाएगी। नए नियमों के तहत फोन में सिम कार्ड न होने पर वॉट्सएप जैसे मैसेजिंग एप काम नहीं करेंगे। कंप्यूटर पर लॉगिन वॉट्सएप भी 6 घंटे में लॉग-आउट हो जाएगा।   समझिए क्या है नया नियम और आप पर कैसे होगा असर?   1. सिम बाइंडिंग का नया नियम कब से लागू होगा? जब आप किसी एप को सिम बाइंडिंग से जोड़ते हैं, तो वह एप तभी खुलेगा जब आपका रजिस्टर्ड सिम कार्ड उसी फोन के अंदर मौजूद होगा। यह नियम 1 मार्च 2026 से प्रभावी होगा।     2. सरकार ने डेडलाइन बढ़ाने से मना क्यों किया? केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि फिलहाल नियमों को मानने की समय-सीमा आगे बढ़ाने पर कोई विचार नहीं है। उन्होंने कहा कि ये नियम राष्ट्रीय सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने के लिए लागू किए गए हैं और सुरक्षा के मुद्दों पर सरकार कोई समझौता नहीं करेगी।     3. मार्च के बाद यूजर्स को क्या करना होगा? यूजर्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका वॉट्सएप जिस नंबर पर है, वह सिम उसी फोन में लगा हो। अगर सिम कार्ड फोन से बाहर निकाला तो मैसेजिंग ऐप काम करना बंद कर सकता है।     4. टेक कंपनियों और संस्थाओं का इस पर क्या रुख है? इंडस्ट्री एसोसिएशन IAMAI ने सरकार को चेतावनी दी है कि हर 6 घंटे में लॉग-आउट करने का नियम प्रोफेशनल्स के लिए परेशानी भरा होगा जो काम के लिए वॉट्सएप वेब पर निर्भर हैं। साथ ही उन परिवारों को भी दिक्कत होगी जो एक ही अकाउंट शेयर करते हैं।     5. कंपनियों ने नियम नहीं माना तो क्या कार्रवाई होगी? केंद्र सरकार के आदेश के मुताबिक ​​कंपनियों को ​120 दिन के भीतर इसको लेकर रिपोर्ट देनी होगी। नियमों का पालन न करने पर टेलीकम्युनिकेशन एक्ट 2023, टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी रूल्स और दूसरे लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।     ज्यातिरादित्य सिंधिया ने दो अन्य मामलों पर भी जानकारी दी…   1. स्टारलिंक की लॉन्चिंग     सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस 'स्टारलिंक' के बारे में सिंधिया ने बताया कि कंपनी ने अभी तक सरकारी सुरक्षा एजेंसियों के सामने जरूरी डेमो पूरे नहीं किए हैं। कंपनी को यह दिखाना होगा कि वह भारतीय सीमाओं के बाहर इंटरनेट एक्सेस बंद कर सकती है। जरूरत पड़ने पर नेटवर्क पर कंट्रोल दे सकती है।     2. BSNL अफसर का मामला     हाल ही में BSNL डायरेक्टर विवेक बंजल के प्रयागराज दौरे का एक सरकारी आदेश वायरल हुआ था। इसमें उनकी सेवा के लिए करीब 50 कर्मचारियों का इंतजाम करने को कहा गया था। सिंधिया ने कहा कि इस मामले में 'कारण बताओ' नोटिस जारी कर दिया गया है। 21वीं सदी के भारत में ऐसा आदेश जारी होना कतई मंजूर नहीं है। हम इसे ऐसे ही नहीं जाने देंगे। विवादों के बीच मंत्री सिंधिया ने ये भी बताया कि सरकारी टेलीकॉम कंपनी BSNL फिलहाल आर्थिक रूप से बेहतर कर रही है और कंपनी "हेल्दी कैश फ्लो" जेनरेट कर रही है।     नॉलेज पार्ट: क्या है सिम बाइंडिंग?     सिम बाइंडिंग एक सुरक्षा कवच है। यह आपके मैसेजिंग एप को आपके फिजिकल सिम कार्ड के साथ 'लॉक' कर देता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि कोई भी हैकर या ठग आपके नंबर का इस्तेमाल किसी दूसरे डिवाइस पर बैठकर नहीं कर पाएगा।

अंतर्राष्ट्रीय समाचार

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ईरान-इजरायल जंग के बीच किम जोंग ने भी कर दिया धमाका! उत्तर कोरिया ने दागी मिसाइल, पड़ोसी देशों में हड़कंप

North Korea Missile Attack On Japan: यह प्रोजेक्टाइल परीक्षण ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच 9 मार्च से 19 मार्च तक वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास चल रहा है.   उत्तर कोरिया ने शनिवार को एक संदिग्ध बैलिस्टिक प्रोजेक्टाइल दागकर एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. यह प्रक्षेपण ऐसे समय हुआ है जब कुछ दिन पहले ही देश के नेता किम जोंग उन ने अपने नए युद्धपोत से क्रूज प्रोजेक्टाइल परीक्षण की निगरानी की थी. इस कदम को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है.   जापान के समुद्री क्षेत्र के पास गिरी प्रोजेक्टाइल   जापान के कोस्ट गार्ड के अनुसार दागा गया संदिग्ध बैलिस्टिक प्रोजेक्टाइल समुद्र में गिर गया. जापान के सार्वजनिक प्रसारक एनएचके ने रक्षा मंत्रालय के एक अज्ञात अधिकारी के हवाले से बताया कि प्रोजेक्टाइल देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के बाहर समुद्री क्षेत्र में गिरी.   अमेरिका-दक्षिण कोरिया सैन्य अभ्यास के बीच प्रक्षेपण   यह प्रोजेक्टाइल परीक्षण ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच 9 मार्च से 19 मार्च तक वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास चल रहा है. उत्तर कोरिया लंबे समय से इन अभ्यासों का विरोध करता रहा है और इन्हें अपने खिलाफ युद्ध की तैयारी करार देता है.   परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता की मांग   हाल ही में प्योंगयांग ने अमेरिका से उसे परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में मान्यता देने की मांग की थी. यह मांग पांच साल में पहली बार आयोजित सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी की कांग्रेस के दौरान उठाई गई थी, जिसमें देश की सुरक्षा और परमाणु नीति पर भी चर्चा हुई.     ईरान पर अमेरिकी हमले की आलोचना   उत्तर कोरिया ने हाल ही में ईरान पर अमेरिका के हमले की भी कड़ी आलोचना की है. प्योंगयांग ने इस कार्रवाई को अमेरिका का 'बेशर्म' कदम बताते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी निंदा की.        

Metroheadlines मार्च 14, 2026 0

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हवाई हमले किए:महिलाओं-बच्चे समेत 4 लोगों की मौत, 15 घायल; तालिबान बोला- इसका जवाब देंगे

Dubai Airport Drone Attack: दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास ड्रोन से हमला, एक भारतीय समेत 4 लोग घायल

दावा- ट्रम्प ईरान के खार्ग आइलैंड पर कब्जा चाहते हैं:

9 दिन बाद भी जंग से दूर शिया लड़ाके, समर्थन में सिर्फ बयान दे रहे

  इजराइल और अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव फैल गया है। इस जंग में ईरान, इजराइल,सऊदी, लेबनान, UAE जैसे मिडिल ईस्ट के कुल 12 देश शामिल हो चुके हैं। हालांकि जंग के 9 दिन बीत जाने के बाद भी अब तक यमन इससे दूर है।   यमन में हूती विद्रोही रहते हैं जो कि ईरान के सहयोगी माने जाते हैं। अक्टूबर 2023 में गाजा जंग शुरू होने के बाद कई बार इजराइल और हूती विद्रोही एक-दूसरे पर हमला कर चुके हैं। पिछले साल जून में इजराइल और ईरान के बीच 12 दिन जंग चली थी, तब भी हूती विद्रोही इस जंग में शामिल थे।   हालांकि इस बार 28 फरवरी से जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब से अब तक हूती विद्रोहियों ने ईरान का समर्थन केवल बयानों के जरिए ही किया है। हालांकि यह साफ नहीं है कि वे आगे भी इस जंग से दूर रहेंगे या नहीं। यमन में अभी तक इजराइल और अमेरिका के हमलों से बचा हुआ है।   अमेरिका-इजराइल के हमले से बचना मकसद   अल जजीरा के मुताबिक एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि हूती जंग में हिस्सा लेंगे। फिलहाल उनका इससे दूर रहना किसी रणनीति से जुड़ा हो सकता है।   मिडिल ईस्ट मामलों पर नजर रखने वाले लुका नेवोला ने अल जजीरा से कहा कि हूती विद्रोहियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि अमेरिका और इजराइल की सीधी जवाबी कार्रवाई से बचा जाए।   पिछले साल अगस्त में इजराइल ने यमन में हवाई हमले किए थे, जिनमें हूती सरकार के कम से कम 12 सीनियर मेंबर मारे गए थे। इनमें प्रधानमंत्री अहमद अल-रहावी और आर्मी चीफ मोहम्मद अल-घुमारी भी शामिल थे।   यह हूती विद्रोहियों के लिए बहुत बड़ा नुकसान था। अमेरिका तथा इजराइल के साथ टकराव में उनकी सबसे बड़े नुकसान में से एक माना गया था।     अहमद अल रहावी की मौत 28 अगस्त 2025 को सना (यमन) में इजराइली एयरस्ट्राइक में हुई थी।   इजराइल के हमलों के बाद हूती विद्रोही सतर्क हुए   इस घटना और पिछले साल हुए अन्य हमलों के बाद हूती लीडरशिप अब ज्यादा सतर्क हो गया है। उन्हें डर है कि अगर वे बड़ा कदम उठाते हैं तो उनके नियंत्रण वाले इलाकों पर भारी हवाई हमले हो सकते हैं।   नेवोला के मुताबिक हूती विद्रोहियों को इजराइल की खुफिया क्षमता से भी डर है और उन्हें आशंका है कि उनकी टॉप लीडरशिप को निशाना बनाया जा सकता है।   हालांकि पिछले साल के नुकसान के बावजूद हूती विद्रोही पूरी तरह कमजोर नहीं हुए हैं और वे अब भी अपने विरोधियों पर हमले करने की क्षमता रखते हैं।   नेवोला के अनुसार अगर अमेरिका या इजराइल सीधे उन पर हमला करते हैं या यमन में उनके विरोधी गुट उनके खिलाफ फिर से सैन्य अभियान शुरू करते हैं, तो हूती फिर से हमले तेज कर सकते हैं।   हूती विद्रोही बोले- जंग के लिए तैयार हैं   हूती नेता अब्दुल मलिक अल-हूती ने इस सप्ताह कहा कि यमन ईरान और वहां की जनता के साथ मजबूती से खड़ा है। उन्होंने कहा कि उनके सैनिक युद्ध के लिए तैयार हैं और हालात के हिसाब से किसी भी समय सैन्य कार्रवाई शुरू की जा सकती है।   यमनी राजनीतिक विश्लेषक सदाम अल-हुरैबी का कहना है कि अगर ईरान उनसे मदद मांगेगा तो हूती युद्ध में शामिल हो सकते हैं। उनके मुताबिक तेहरान फिलहाल अपने सभी विकल्प एक साथ इस्तेमाल नहीं करना चाहता और वह आने वाले समय के लिए हूती विद्रोहियों को एक अहम ताकत के रूप में बचाकर रखना चाहता है।   अल-हुरैबी ने कहा कि अगर अमेरिका और इजराइल के हमले नहीं रुकते, तो हूती लंबे समय तक चुप नहीं बैठेंगे। उनके अनुसार सना और हूती विद्रोहियों के नियंत्रण वाले अन्य इलाकों में युद्ध की तैयारी चल रही है।   हूती विद्रोहियों के पास रेड सी में फिर से अशांति फैलाने की क्षमता है। वे ड्रोन और मिसाइल के जरिए इजराइल पर भी हमला कर सकते हैं। अल-हुरैबी का कहना है कि ऐसा होना लगभग तय है, बस यह हूती विद्रोहियों और ईरान के तय समय पर निर्भर करेगा।   हूती विद्रोहियों के पास कई लक्ष्यों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला करने की क्षमता है। नेवोला के अनुसार अगर युद्ध लंबा चलता है और हूती विद्रोहियों को सीधे खतरा महसूस होता है, तो वे अपने हमलों का दायरा बढ़ाकर इजराइल, अमेरिकी युद्धपोतों, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजराइल के सहयोगी देशों जैसे संUAE और सोमालिलैंड को भी निशाना बना सकते हैं।   यमन में खामेनेई की मौत के बाद 1 मार्च को ईरान के समर्थन में रैली निकाली गई। इसमें खामेनेई की तस्वीर को चूमता एक युवक।     जहाजों पर हमला कर सकते हैं हूती विद्रोही     साल 2023 के आखिर से लेकर 2025 तक हूती विद्रोहियों ने रेड सी से गुजरने वाले जहाजों पर लगातार हमले किए थे। इस अभियान में कम से कम 9 नाविकों की मौत हुई और चार जहाज डूब गए। इससे रेड सी के ट्रेड पर बड़ा असर पड़ा, जहां से हर साल लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का सामान गुजरता था।   अमेरिका और इजराइल के हालिया हमलों में ईरान के कई राजनीतिक और सैन्य नेताओं की भी मौत हुई है। अगर ईरानी शासन कमजोर पड़ता है या गिर जाता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान यमन के हूती विद्रोहियों को भी हो सकता है।   अल-हुरैबी के अनुसार अगर ईरान कमजोर होता है, तो यमन तक पहुंचने वाले ईरानी हथियारों की तस्करी कम हो सकती है या पूरी तरह बंद हो सकती है। यह हूती विद्रोहियों के लिए बड़ी चुनौती होगी।   संयुक्त राष्ट्र ने 2022 में कहा था कि अरब सागर में पकड़े गए हजारों हथियार शायद ईरान के एक ही बंदरगाह से भेजे गए थे।   संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि रूस, चीन और ईरान में बने हथियार नावों और जमीन के रास्ते यमन में तस्करी करके पहुंचाए जाते थे। हालांकि ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है।     कौन हैं हूती विद्रोही     साल 2014 में यमन में गृह युद्ध शुरू हुआ। इसकी जड़ शिया-सुन्नी विवाद है। कार्नेजी मिडिल ईस्ट सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों समुदायों में हमेशा से विवाद था जो 2011 में अरब क्रांति की शुरुआत से गृह युद्ध में बदल गया। 2014 में शिया विद्रोहियों ने सुन्नी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।   इस सरकार का नेतृत्व राष्ट्रपति अब्दरब्बू मंसूर हादी कर रहे थे। हादी ने अरब क्रांति के बाद लंबे समय से सत्ता पर काबिज पूर्व राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह से फरवरी 2012 में सत्ता छीनी थी। हादी देश में बदलाव के बीच स्थिरता लाने के लिए जूझ रहे थे। उसी समय सेना दो फाड़ हो गई और अलगाववादी हूती दक्षिण में लामबंद हो गए।   अरब देशों में दबदबा बनाने की होड़ में ईरान और सऊदी अरब भी इस गृह युद्ध में कूद पड़े। एक तरफ हूती विद्रोहियों को शिया बहुल देश ईरान का समर्थन मिला। तो सरकार को सुन्नी बहुल देश सऊदी अरब का।   देखते ही देखते हूती के नाम से मशहूर विद्रोहियों ने देश के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। 2015 में हालात ये हो गए थे कि विद्रोहियों ने पूरी सरकार को निर्वासन में जाने पर मजबूर कर दिया था।    

Metroheadlines मार्च 9, 2026 0

नेपाल में कांग्रेस-वामपंथी पार्टियों का सफाया:चार साल पुरानी पार्टी RSP ने 36 सीटें जीतीं, 83 पर बढ़त; बालेन शाह का प्रधानमंत्री बनना तय

भारत विरोधी ओली 4000 वोटों से पीछे:बालेन शाह से अपने गढ़ में मिल रही हार, 4 साल पुरानी पार्टी RSP सबसे आगे

ईरान बोला-अमेरिका ने भारत के गेस्ट शिप पर हमला किया:उन्हें करारा जवाब देंगे; अमेरिकी संसद में ईरान पर हमला रोकने वाला प्रस्ताव फेल

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना डेंजर जोन! 1.5 करोड़ बैरल तेल यहीं से होता है सप्लाई, भारत-चीन का बड़ा नुकसान क्यों?

  US Israel Iran Strike: मिडिल ईस्ट में पैदा हुए तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही घट गई है. इस वजह से तेल सप्लाई पर खतरा मंडराने लगा है.     मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष का सीधा असर Strait of Hormuz पर दिख रहा है. ये जलमार्ग पहले दुनिया का अहम व्यापारिक रास्ता था, अब वह हाई रिस्क जोन बन गया है. पिछले कुछ दिनों में यहां कई जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल जैसे हमले हुए हैं. कुछ टैंकरों को नुकसान पहुंचा है और एक क्रू मेंबर की मौत की भी खबर है. होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान की दक्षिणी सीमा पर स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है. दुनिया की तेल सप्लाई का करीब 20 फीसदी हिस्सा और एलएनजी (LNG) की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से गुजरती है.   होर्मुज जलडमरूमध्य से हर दिन करीब 1.5 करोड़ बैरल तेल इसी मार्ग से निर्यात होता है. इसमें सऊदी अरब की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा (38 फीसदी) है. इसके अलावा इराक (22 फीसदी), यूएई (15 फीसदी), ईरान (11 फीसदी), कुवैत (9 फीसदी) और कतर (5 फीसदी) भी इसी रास्ते पर निर्भर हैं. इसके अलावा Strait of Hormuz के जरिए कच्चे तेल का भी निर्यात होता है, जिसमें चीन (33 फीसदी), भारत (13 फीसदी), दक्षिण कोरिया (12 फीसदी), जापान (11 फीसदी), अन्य देश (17 फीसदी) और अन्य एशियाई देश (14 फीसदी) हैं.     जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट     लॉयड्स लिस्ट के अनुसार, आम तौर पर रोज लगभग 107 जहाज इस रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन 1 मार्च को सिर्फ 19 जहाजों की आवाजाही दर्ज की गई. एक दिन पहले जहां 22 सुपरटैंकर गुजरे थे, वहीं 1 मार्च को यह संख्या घटकर सिर्फ 4 रह गई. जो जहाज गुजर भी रहे हैं, वे बहुत धीमी गति से चल रहे हैं. इससे ट्रांसपोर्ट का समय बढ़ रहा है और सप्लाई चेन पर दबाव पड़ रहा है. ऐसे हालात में माल ढुलाई की लागत और बीमा प्रीमियम बढ़ जाते हैं, जिससे तेल की कीमतों में उछाल आता है.     भारत और चीन पर असर     भारत खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस आयात करता है, जो इसी जलमार्ग से होकर आता है. अगर सप्लाई में रुकावट आती है तो भारत में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, रुपये पर दबाव पड़ सकता है और महंगाई बढ़ने का खतरा रहेगा. चीन भी खाड़ी पर निर्भर है, लेकिन उसके पास रूस और मध्य एशिया से पाइपलाइन कनेक्शन और बड़ा भंडार है, जिससे उसे कुछ राहत मिल सकती है.     अमेरिका की भूमिका     अमेरिका की नौसेना इस क्षेत्र में काफिलों को सुरक्षा दे सकती है और एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर सकती है. इससे कुछ हद तक जोखिम कम किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह खतरा टलना आसान नहीं है.  

Metroheadlines मार्च 3, 2026 0

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अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमला किया, कई शहरों में धमाके:सुप्रीम लीडर खामेनेई सुरक्षित जगह भेजे गए; अमेरिका से बातचीत के बीच अटैक !

मोदी इजराइल के होलोकॉस्ट मेमोरियल पहुंचे:हिटलर शासन में मारे गए 60 लाख यहूदियों को श्रद्धांजलि दी; राष्ट्रपति से मिले, डिफेंस डील संभव

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Metroheadlines मार्च 12, 2026 0

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